गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

नव वर्ष

जीवन एक संघर्ष है,

अनेको अवसाद और कुछ हर्ष है!

राहें आसान हो जाती हैं,

यदि साथी कोई आपका समदर्ष है!जीवन एक....

दिन,घडी ,साल, महीने,

यूँ ही बीते,फ़िर आ गया नव वर्ष है!जीवन एक.....

हर कोई यूँ ही दौड रहा,

फ़िर भी न जाने क्यूँ एक अपकर्श है! जीवन एक....

कुछ ऐसा करो इस साल,

सब कहें बदल रहा ,कुछ इस वर्ष है ! जीवन एक....

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

इश्क के चर्चे

तेरे इश्क के चर्चे , अब सरे आम हो गये हैं ,

कल तक थे क्च्चे, अब पके आम हो गये है !

तेरी गली के कुत्ते ,जो भौंका किये थे मुझ पर,

अब तो उन्ही मे हम भी, गुमनाम हो गये हैं! तेरे इश्क ........

तुझे कालेज पँहुचा-पँहुचा, थक गया हूं मै भी,

आस्माँ को छूते अब, पैट्रोल के दाम हो गये हैं !तेरे इश्क .....

कभी मिलने का मौसम, बना ही डालो जानम,

अब तो अपने ही घर मे, बदनाम हो गये हैं ! तेरे इश्क .....

शादी के वास्ते पापा से, मिलने का है इरादा,

चक्कर लगा-लगा के,चक्के ही जाम हो गये हैं! तेरे इश्क ....

ग्रहस्थी चलाने के लिये,इक पहिये की है ज़रूरत,

बन जाओ तुम ही खानम, सुबह से शाम हो गये हैं!

तेरे इश्क के चर्चे , अब सरे आम हो गये हैं !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007 

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

धरा की धरोहर

धरा की धरोहर हैं -हवा ,वृछ और पानी !

प्रदूषित होती जा रही ,इसकी यही कहानी !!
वेद और शास्त्रों में पूज्य,यह सब सनमानी !
भूल गए हमारे बच्चे ,होकर अति अभिमानी !!
वायु- प्रदूषण से ग्रसित ,घूम रहे श्वास के रोगी !
जल-प्रदूषण से त्रसित , पथरी-पीलिया के भोगी !!
वृछ काट-काट कर, पत्थर के जंगल बन रहे !
आक्सीज़न के दाता , गमलो में केवल पल रहे !!
कैसे हो जीवनदायी तत्वों का,पूरा संरक्चन ?
जब उसके रक्चक ही ,कर रहे उनका भक्चन !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा २८२००७

रविवार, 5 दिसंबर 2010

जीवन एक मकान किराये का

जीवन एक मकान किराये का,

फ़िर यामे रहिबे को सुख कहे का! जीवन एक.....

कौन दिना नोटिस आ जावे,

कोऊ न जाने, फ़िरहूं घूमे इतराये सा! जीवन एक....

या जीवन मे आना है एक मानी,

नही किया कुछ, बेकार फ़िरै बौराये सा !जीवन एक.....

तन मिट्टी का,याही मे मिल जावेगा,

चौथेपन मे जागे से,का मिल पायेगा ! जीवन एक.....

धन-दौलत ,दुमहले, यहीं छुट जावेगा,

मानव-धर्म का भरम तभी टुट जायेगा !जीवन एक.......

या जीवन जब कछु नही कर पावेगा,

दूजी यौनी मे फ़िर,का तोप चलावेगा ! जीवन एक......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

सोमवार, 29 नवंबर 2010

समाज

पहले खून का रिश्ता होता था ,
अब रिश्तों का खून हो रहा है !
पहले बात होती थी सम्मान की,
अब जमीर ही शून्य हो रहा है !!पहले खून .....
पहले गाँव की लड़की होती थी ,
अब बहन का रिश्ता न्यून हो रहा है!!पहले खून ...
पहले समाज की मर्यादा होती थी,
अब समाज ही शून्य हो रहा है !! पहले खून.....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा २८२००७

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

बेटी का बाप

ऐसा लगता है कि बात कल की ही है,

जब मैने अपनी बेटी को रुखसत किया !

बता सकता नहीं मैं कुछ भी आपको ,

कि यह चाक दिल मैने, कैसे-कैसे सिया !! ऐसा लगता है....

उसके रुखसार पर बहते हुए आँसू देख,

सोचा गम न कर,उसको मिल गया है पिया!! ऐसा लगता है ....

गले जब मेरे लगी,कलेज़ा मुँह को आ गया,

कह कुछ न पाया ,लगा वार दिल पर किया!! ऐसा लगता है....

अच्छी तालीम और दहेज़ देकर भी घबराता हूँ,

फ़िर भी उन्होने सीना उसका छलनी किया !! ऐसा लगता है.....

आज भी टेलीफ़ोन पर ,रोने की आवाज़ आती है

न जाने क्यूँ लगता है,किसी ने कुछ किया !! ऐसा लगता है...

अब तो सुबह,अखबार पढने से डर लगता है,

दहेज़-लोभियों ने,बेटी को तो नही जला दिया!!ऐसा लगता है....

आप नही समझेंगे, मै एक बेटी का बाप हूँ,

फ़िर क्यूँ उसे देवी का दर्ज़ा उन्होने है दिया !!ऐसा लगता है.....

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

कैसो सुन्दर सासरो?

म्हारो कैसो नीको कैसो सुन्दर सासरो?

जाने दियो है मोकूं, जीवन भर को आसरो !

म्हारी कैसी सुन्दर, सुघढ,सलोनी सासू जी?

ना कबहूं डाँटे-डपटें,ना आवन दें वे आँसूजी ! म्हारो......

म्हारी कैसी सुन्दर,सुघढ,सलोनी चाची जी ?

सबकी लेत फ़िरें खबरिया,इते-उते आती जी! म्हारो.....

म्हारी कैसी सुन्दर,सुघढ,सलोनी जेठानी जी?

घूँघटा जो कभी उठावें,भरवा दें सबको पानीजी!म्हारो......

म्हारे कैसे सुन्दर सुघढ ,सलोने देवरा जी ?

ऐसे चमकें-दमकें,जैसे कुन्दन को हो जेवंराजी !म्हारो....

म्हारो कैसे सुन्दर,सुघढ,सलोने बींद जी ?

सारे गाम की महरारू की,उडाय दई है नींदजी !म्हारो....

म्हारो ऐसो नीको,ऐसो सुन्दर सासरो,

अब न मोये ,अम्मा-बापू को आसरो! म्हारो......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

सोमवार, 1 नवंबर 2010

दीवाली

कल फ़िर कलुआ

भूखा सो गया,

पटाखों के शोर से

अचानक उसकी आँख खुल गई !

देखा द्वार पर

लक्छ्मी जी खडी हैं,

उसने पूछा-"कया चहिये?"

देवी बोली-"सेठ रतन चँद के आई थी,

सोचा तुम्हारे हाल पूँछ लूं!"

कलुआ बोला हाल तो

मँहगाई के पूछे जाते हैं,

गरीब तो मर ही रहा है!

हाँ तुम भी रईस सेठ के घर आती हो,

आज यह कलई भी खुल गई !!

लक्छ्मी जी बोलीं "दीवाली नही मनाओगे?"

कलुआ बोला "माता क्यों ठिठोली करती हो?

गरीब तो दीवाली क्या,

दीवाला भी नही मनाता !

वो भी रईसों के हिस्से मे हैं!

बच्चों की अम्मा खील लाई थी,

सो पानी मे घोंट कर पिला दी !

पटाखे और मिठाई दूर की,

आज़ तो दाल और तरकारी भी

किसी रईस के घर निकल गई !!

क्यों नीँद से जगा दिया ?

सपने मे दाल-भात खा रहा था

वो भी फ़ैला दिया !

बच्चों को तो ज़ल्दी सोना था,

क्योंकि सुबह सेठानी त्योहारी देगी ही!

उसीसे यह समझते हैं कि-

उनकी तो लाटरी निकल गई !!"

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

चौबन की छोरी !

आज तलक याद है मुझे, वो चौबन की छोरी !

कैसी सुन्दर कद -काठी, और कैसी गोरी गोरी !!

स्कर्ट-ब्लाऊज़ पहन जब वो, विद्यालय जाती थी !

अच्छे-अच्छों की तब ,आह निकल जाती थी !!

उसके नखरे,उसका गुस्सा,सब उससे डरते थे !

हिम्मत नही किसी की पडती,पर सब मरते थे !!

भाई-बहन की तरह जब हम संग-संग पढते थे!

कभी हँसते, कभी इठलाते और कभी झगड्ते थे !!

पता नही वो प्यार सच्चा था या फ़िर झूठा था !

जैसा भी था पर वो प्यार,भी खूब अनूठा था !!

पता नही कब वो मेरे मन-मन्दिर मे आ बैठी !

जान न पाया क्योंकि वो भी रहती थी एँठी-एँठी!!

मैं उनके लिये दूल्हा,वो मेरे लिये दुल्हन देखा करती!

पता नही था वो समबन्धों मे,क्या- क्या रंग भरती ?

माँ जेठानी कह पैर छुआ करती,वो उनकी समधन है !

पता नही इस जनम का या कई जनमों का बँधन है!!

सच है- संबोधन बदलने से प्यार, कभी नही बदलता है!

प्यार प्यार ही होता है , केवल समय वही बदलता है !!

राखी के रिश्ते ,समय चक्र संग फ़ीके पड जाते हैं !

पर दाम्पत्य जीवन के तो,धीरे-धीरे गड जाते हैं!!

बेशक लोग बदमाश -बेहया कहें, मुझे शर्म नही है !

संतति हेतु समर्पण विधि सम्मत है,दुष्कर्म नही है !!

इतना बडा सत्य,केवल "बोधिसत्व"लिख सकता है !

दूसरों पर हर कोई लिखता,अपनी नही लिख सकता है!!

उसने! मेरे उपवन मे है, एक सुन्दर फ़ूल उगाया है !

कह सकता हूं उसने ही, मेरा घर-आँगन महकाया है!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा  282007

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

शरद पूर्णिमा

शरद पूर्णिमा की धवल चाँदनी,

कह रही इक नयी मधुर रागनी !

रात है क्रष्ण के महारास की ,

गोपियों के मधुमास की !

अम्रत बरस रहा है नभ से ,

करें आचमन लक्छ्मी तप से !

ताज चमक रहा है यूं चमकी,

चाँद की आभा- कान्ति दमकी !

प्रेम-प्रसून हैं मदन मुरारी .

उनको स्म्रत करती राधे प्यारी !

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा २८२००७

सोमवार, 18 अक्टूबर 2010

दर्द की दास्तान

हर दर्द की एक दास्तान होती है ,

पहले कभी किसी की मुस्कान होती है!

सरे राह चलते कभी कोई मिल जाता है,

गर मुस्कुरा दे तो ज़िन्दगी आसान होती है !! हर दर्द की........

प्यार मे जब तलक अश्क नही छलकते,

दोज़ख भी तब तलक परिस्तान होती है !! हर दर्द की .....

इश्क मे कोई मझनू,कोई फ़रहाद होता है,

तब कही उसकी कहानी परवान होती है !! हर दर्द की .....

लैला और शीरी वो ही कहलाती है,

जिसकी मुहब्ब्त रुसवा सारे जहान होती है! हर दर्द की ......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

सपन

जब जब कभी तुम्हारा कोई पैगाम आया है,

बागों मे बहार न थी, फ़िर भी दिल महकाया है!

तेरे तस्स्वुर मे पूरी रात आंखो मे गुज़ार दी,

भोर मे आँख लगी,तो मुर्गे ने फ़िर बाँग दी !

चन्द लम्हों का ही सही ,साथ अच्छा था,

तुम न आए कोई बात नही,तुम्हारा साया है!! जब-जब......

जब कभी हम ख्वाबों मे आएं, आँख बन्द रखना,

बाहों मे न सही,आँख के दरीचे मे ही बन्द रखना!

हमे इस अह्सास से ही सब्र तुमने संग सुलाया है!! जब-जब...

तुम्हारे ज़िस्म की गर्मी का,इतना मुझे अह्सास होगा,

जब भी दिल से आह निकलेगी ,तेरा सनम पास होगा!

जागते सब बुलाते हैं,तूने मुझे सपनों मे सजाया है!! जब-जब...

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

कब सवेरा होगा ?

समझ नहीं आता कि कब सवेरा होगा ?
जनता घोड़े बेच सो रही,जब होगा तब होगा !
दिनोदिन संगीन के साए बढ़ते जा रहे  ,
जैसे फल ,सब्जी ,दाल के भाव चढ़ते जारहे !
सियासत में तो सब चोर से ही लगते हैं ,
खिलाफत में हैं तो कमज़ोर से ही लगते हैं   !
अब तो न तू कह मेरी ,न में कहूं तेरी ,
देखना जल्द आयेगी एकदिन ,फिर सुबह मेरी !
या रब भले लोगों का भी क्या कोई दिन होगा ?
चुप बैठ ऐ दिल रात ही सा सही  वो दिन होगा !
मुझे किसी और से ऐ ज़नाब  क्या लेना ?
अगली पीढी को फिर  भी कुछ हिसाब है देना !
जो है ज़रा भी पानीदार ,वो शर्मसार हैं ,
जिन्हें शर्म ही नहीं आती ,वो गद्दार हैं !
बुजुर्गों ने कहा ,"जब जागो तब सवेरा है"
जागे तब कौन जब चारो ओर ही अंधेरा है !

गुरुवार, 30 सितंबर 2010

फैसला

 बाढ की विभीषिका मे सब कुछ बह गया,

आपसी बैर और वैमनस्य फ़िर भी रह गया!

जब राम की नगरी मे ,मर्यादाये टूट्ती है ,

तब आस्थाओं की सीमाएं पीछे छूटती हैं!!

राम-रहीम के देश मे धार्मिक उन्माद नही होगा

तभी सभ्यता और संस्क्रति का विकास होगा !!

किसी फ़ैसले से भाई- भाई से अलग नही होगा,

भारत माँ की शपथ उससे कोई बिलग नही होगा!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा २८२००७

बुधवार, 29 सितंबर 2010

बौस छुट्टी पर है?

आज फ़िर कुछ होना है,

किसी के घर खुशी,

किसी के घर रोना है ! आज फ़िर कुछ....

सुबह से इसी उधेड बुन मे,

कभी कुछ भूल जाता हूं,

पर आफ़िस पहुंच,

खुशी से फ़ूल जाता हूं! आज फ़िर कुछ....

आज बौस छ्ट्टी पर है,

कमैन्ट्री सुनेगे ,सर्फ़िगं करेंगे!

किसी छोरी से छोरी,

बन ढेर सारी बातें करेंगे! आज फ़िर कुछ.....

प्रेम की पींगे बढेंगी,

पर क्या पता उधर भी

बौस आज छुट्टी पर हो! आज फ़िर कुछ..
बोधिसत्व सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा २८२००७

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

राम- जुहार

राम हमारे खुदा तुम्हारे यह क्या पागलपन है?

राम जुहार बस बनी रहे ,यह सच्चा जीवन है!

कभी मुह्ब्ब्त मे किसी को अपना बनाकर देखो,

कभी राम-लला को भी, मस्ज़िद मे बैठाकर देखो!

सुबह-शाम करते थे हम, आपस मे प्यार से बातें,

अब क्यों करने लगे हैं,आपस मे तकरार की बातें?

राजनीत और धार्मिक-क्ट्टर पथं मे क्या धरा है?

जो जहां रहता ,गगन उसी का और उसी की धरा है!!

गावं-देश को मत एक-दूजे के, खूं से लाल करो तुम,

फ़ैसला कुछ भी आये,सारे गगन मे गुलाल भरो तुम!

दुनिया मे अब मज़हब का, नाम बदनाम न होने पाये,

सच्चा मज़हब वो ही है , भटके हुओं को राह दिखाये!!

राम-रहीम के देश मे ,होंगी नही तकरार की बातें,

सगं-सगं पले-बडे हुये ,होंगी बस अब प्यार की बातें!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७ मो:९४१२४४३०९३

बुधवार, 22 सितंबर 2010

kisaan

उनके दर्द को कौन समझे?

दो दिन से बच्चों ने रोटी खाई नही,

मां होकर भी उसे

रुलाई आई नही!!

कभी सूखे ने,

फ़सल तबाह कर दी!

कभी बाढ ने

बिल्कुल स्वाह कर दी!!

अब बात खेतों के ,

अधिग्रहण की है !

जीवन पर लगने वाले

पूर्ण ग्रहण की है!!

इसीलिये रोने के बज़ाय,

लाठी उसने उठाई है!

प्रजातन्त्र मे भी,

शासक-शासित मे

कितनी बडी खाई है!!

शासक तो करोडों से

महल बना रहा है!

शसित पुश्तैनी ज़ायदाद

के लिये अपना खून बहा रहा है!!

वैसे हमारे देश मे,

प्रजातान्त्रिक सरकार है!

सम्पत्ति हमारा मौलिक अधिकार है!

इसीलिये विकास के नाम पर,

गरीबों पर पड रही मार है!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७











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शनिवार, 18 सितंबर 2010

दर्द

कभी-कभी गर्मी मे भी मौसम सर्द होता है,
किसी के भी आंसू देख दिल मे दर्द होता है!
ज़ख्म को जितना भी छुपाना चाहो तुम,
पर अपनो के सामने ही वो बेपर्द होता है !! कभी- कभी.......
खुशियां हैं तो लाखों दोस्त साथ होते हैं,
पर गम मे भी साथ दे,वो हमदर्द होता है !! कभी- कभी......
खुशी मे तो बियांवां भी बागवां लगता है,
पर गम मे बागवां भी गुबारे-गर्द होता है !! कभी-कभी .......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मंगलवार, 8 जून 2010

लेखनी

लेखनी
यह लेखनी मेरी यू ही कभी रुकती नही!
अनाचारी,आतताईयो के आगे कभी झुकती नही!!
कभी यह डल झील सी शांत और निढाल है,
तो क्भी इसमे ज्वालामुखी सा उबाल है!
ऊपर से शांत हो ,आग भीतर की कभी बुझती नही!! यह लेखनी.........
प्यार की पींगे भरती है यह कभी,
विरहणी की तरह तपती है यह कभी!
नियति के निर्बाध क्रम् से यह कभी थकती् नही!! यह लेखनी.....
इतिहास के दर्द् को अंक मे समेटे हुए,
मानव-मूल्यो की शर-शैया पर लेटे हुए!
प्रतिकार की फ़ुंकार फ़िर भी कभी रुकती नही !! यह लेखनी.......
धर्म और सस्कारो की अवधारणा सी,
गुरु और पित्र की सबल प्रताड्ना सी!
नित नये परिवर्तनो से कभी यह डरती नही!! यह लेखनी .......
सरस्वती का है निमंत्रण"कभी निस्तेज़ होना नही",
किसी भी रंग मे रंगकर, खुद रंगरेज़ होना नही!
समाज का अंकुश है यह,समय की धुरी कभी रुकती नही!!यह लेखनी.......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा २८२००७

गुरुवार, 27 मई 2010

maanav muly

मानव मूल्यों का, जब कभी पतन होता है,
संस्क्रति सिसकतीहै,और तभी वतन रोता है!
जब नारी- मां,बहन और बेटी हुआ करती थी,
तब मां भी घर में, बेटी होने की दुआ करती थी!
अब बेटी को हम ,जीन्स-पैन्ट पहन डुलाते हैं,
और बेटी को बेटा बनाने का, khud मुकुट लगाते हैं !
वस्त्रों से स्तन-उरोज़ दिखा कर,यौन-निमन्त्रण करते हैं,
इसीलिये पथ पर ही,दुशासन रोज़ चीर-हरण करते हैं!
आज बहू-बेटी संग बैठ ,टीवी पर उत्तेजक चित्रपट देख रहे
,अपनी संस्क्रति को दे तिलांजलि ,पाश्चात्य को सहेज़ रहे!
कथ्थक,भरत-नाट्यम भुला, मम्मी कामुक-नर्तन सिखा रही,
बेटी को धन-कुबेर बनने का,दिवा-स्वप्न भी हैं दिखा रही!
समाचार पढा- श्वसुर बहू संग ,रोज़ बलात्कार करता है,
धिक्कार है! क्यों नही उसका अन्तस चीत्कार करता है?
बहन-भाई के रिश्ते में भी, अब व्याभिचार हो रहा है,
पता नही कब कहां,मानव-मूल्यों का तिरस्कार हो है !
पता नही क्यों ? हम चर्चा कर रहे इस अभिशाप की,
हो सकती है यह घट्ना घर मेरे, या फ़िर आप की !
वे कह्ते हैं -"हर युग में ऐसा होता रहा है,
मानव पशु-कर्म करे,और भगवन सोता रहा है!
वो कहती -"अजी चुप बैठिये !आपकी उम्र का तकाज़ा
हैसमय-सारथी संग चल रहे हैं, उसी ने यह हमें नवाज़ा है!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरवनिकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७१६-३-१०SAMVEDNA

सफ़र

सफ़र
९४१२४४३०९३
ज़िन्दगी के सफ़र मे जाने कौन कब जुड जाता है ?
दो कदम साथ चल कर न जाने कब बिछुड जाता है?
मिलने-बिछुड्ने का समय ,पहले से सुनिश्चित होता है!
पता नही फ़िर क्यों यह दिल, बिछुड्ने पर यूं रोता है?
प्रीति की यही रीति है,मिलन- वियोग अव्श्यम्भावी है !
कभी प्रीत की जीत मे खुशी, कभी हार का दर्द हावी है!!
मैने सर्द रातों मे प्यार के दर्द को कई बार झेला है !
कभी हर पल का साथ था,आज बिल्कुल अकेला है !!
सब जानते हैं साथ चलने की कसम,सरासर झूठी है!
कभी मै उससे रूठा नही,पर आज़ वो मुझसे रूठी है !!
फ़िर क्यों लोग बेवज़ह, साथ चलने की कसम खाते है?
करते है बार -बार वादा, खुद ही वादे से मुकर जाते है!!
जब वो वादा तोडते है, सच भीतर बडी तकलीफ़ होती है!
कभी चुपचाप दिल रोता है ,तो कभी आंख नम होती है!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

रविवार, 9 मई 2010

मां तुझे प्रणाम


इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

soory

सूर्य
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अब तो मानव तुमसे,तुमको चुराने चला है!
ऊर्जा का श्रोत तुम, तुम्हे ही मिटाने चला है!!
मानव ने सदैव से ही,प्रक्रति को छला है!
अस्तित्व पर घात करता, भई वाह क्या बला है?
ऊर्जा का कर रहा दोहन,विकास से ही पला है !!
प्रक्रति को मिटाना भी, इसकी एक कला है?
पहले पेड-पौधो से ही,इसका चूल्हा जला है!!
फ़िर धरती के सीने से कोयला-तेल मिला है!
खत्म कर सभी को,अब सौर-ऊर्जा पर पिला है!!
अपनी भूख की खातिर, फ़िर प्रक्रति को तला है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७

शनिवार, 17 अप्रैल 2010

किस्मत वाले

बहुत किस्मत वाले होते हैं ,जिनकी मोहब्बत उनके पास होती है !
उनकी सुबह आम सही ,पर रात तो उनकी खास होती है !
उन्हें दूरियों का अहसास ,क्योंकर नहीं होता है ?
गम कोइ भी हो लेकिन,दिल कभी नहीं रोता है !
किसी गम या दर्द का,उनको कभी अहसास होता नहीं !
अपना कोइ पल किसी के,इंतज़ार में वो खोता नहीं !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

yaade

यादें
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भूलना चाहो जितना,उतना ही सताती हैं तुम्हारी यादें!
दिन तो कट जाए मगर,सारी रात रुलाती हैं तुम्हारी यादें!!
याद आती है सरे शाम ,तेरे ज़ुल्फ़ों की भीनी खुश्बू,
मस्त कर जाए मगर ,क्यूं दीवाना बनाती है तुम्हारी यादें!! भूलना चाहो....
याद आती है शबे सर्द में, तेरे जिस्म की गर्मी,
मैं पिघल जाऊंमगर, यह तो मोम बनाती है तुम्हारी यादे !!भूलना चाहो.....
याद आती है तेरी नम आखों से,अश्कों की लडी,
पी तो जाऊं मैं मगर, यह तो प्यास बढाती है तुम्हारी यादें भूलना चाहो .....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

साम्प्रदायिक सदभाव ---------------------

साम्प्रदायिक सदभाव
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साम्प्रदायिक सदभाव का समन्दर इतना गहरा नही,
डरते हैं लोग वे,जिन्होने कभी इस्मे तैरा नही !
प्यार और मोहब्बत के गोतखोरों को कोइ एतराज़ नही,
पंडित औ मुल्ला क्यों टांग अडाते,उन्के बाप का राज़ नही!
संगीन के साये में हमने , कई साल गुज़ारे है,
हम आपस मे लडते रहें,तभी तो उन्के पौवारे हैं!
खुशी होती है,जब हम आपस मे बैठ हुक्का गुड्गुडाते हैं,
यह बात उन्हे रास आती नही,इसीलिये हमे लडाते हैं!
जिनके लिये "औरत केवल बच्चा पैदा करने की मशीन है"
वे कम्ज़र्फ़ हैं,पढ्ने- पढाने से डरते हैं,और वाकई कमीन हैं!
औरत ,मां -बहन और बेटी बन ,घर को सजाती,सेवारती है
हमारे मज़हब मे तो वो,देवीहै ,पूजा है और आरती है !!
बोधिसत्व कस्तूरिय २०२ नीरव निकुन्ज सिकनदरा आगरा २८२००७


गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

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टीवी
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प्रेम ,समर्पण और सदाचार,
हो गये-पापड,चटनीऔर अचार!
हर घर,हर चैनल पर पड रही इनको मार,
मात-पिता भी हो गये,अब कितने लाचार!
उनकी बातें घर मे,समझ किसी को नहि आती,
रोडीज़ पर आने को,बहू-बेटी मन ही मन ललचाती!
काश ! राहुल के स्वयंवर मे,मैं भी जा पाती,
बिन शादी के ही, शादी के सारे सुख पा जाती!
एन डी टी वी घट रही थी,जब टी आर पी,
राखी के फ़र्ज़ी स्वयंवर की तैय्यारी कर दी!
शादी के सुख मे,दुख बहुतेरे हैं,
बिन शादी सुख भोगें,नयेचितेरे हैं१
लिव-इन-रिलेशन शिप मे,लाखोंसुख भोग रहे,
रख कन्डोम पर्स मे,एच आई वी को रोक रहे!
अनवान्टेड ७२ से मिल गया,वैश्याव्रत्ति को लाइसैन्स,
घर वाले कुछ बोले तो,कर दे सबको ये साइलैन्स!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

बुधवार, 31 मार्च 2010

रिश्ते-नाते

कंक्रीट के इन जंगलोंमें सूर्य कहीं दिखता नहीं,
भ्रम हो्ता है कि कभी उगता है, या उगता नही!
तितली और भ्रमर , कभी इधर गुन्जन करते नही,
नन्हों के चित्रों में ,इसीलिये कभी ये उभरते नहीं !’
चन्दा की चौदह कलाएं,समझ इन्हे आती नही ,
मल्टीस्टोरीड में रौशनी,इसकी कभी आती नही!
दादा-दादी से इन्होने,कहानी कोई कभीसुनी नही,
क्योंकि मां-बाप से ज़्यादा कोई और गुनी नही !
मां ने जिसे कपडे ,सिल- सिल कर पाला है,
उसीकी आवाज़ आज,कोई नही सुनने वाला है!
जिस मां ने चूल्हा फ़ूंक-फ़ूंक रोटी पकाई थी,
आज अपने ही घर मे,हो गई वोही पराई सी!
घर में ही वो ,कदम फ़ूंक-फ़ूंक कर धरती है,
क्योंकि हर आहट पर,डांट उसी पर पडती है!
इन बहु-मन्ज़िली भवनोमें,कौन किसे ढोता है,
पडोसी की गमी पर,पडोसी कोई नही रोता है!
यह नई सभ्यता,समय और नये संस्कार हैं,
रिश्ते-नाते नींव मे दबे,युवाओं के विचार हैं!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा २८२००७

kadachaar

कदाचार
आज कहां गये वो साधू-सन्त और वैरागी?
कहां वो गये परम-हंस,शिरडी साईंसे त्यागी!
बडे-बडे मठाधीश,और मंह्त बने फ़िरते हैं,
सत्ता-सम्पत्ति हेतु, अबलाओं को ठ्गते फ़िरते हैं!
अभिशाप बने यह,प्रथ्वी पर संताप जगाते हैं,
दीन-हीन को दुतकार,धनवानों को गले लगाते हैं!
मंदिर-मस्ज़िद,गुरुद्वारे,अब केवल धन से चलते हैं,
निष्काम भाव नही है,छल-बल के मदसे पलते हैं!
धर्म -कर्म् के नाम से ,यह अपनी दूकान लगा बैठे है,
सत्ता-धारियों के समकछ, समपत्ति बटोर यह ऎठे हैं !
समझ नही मै पाता,निर्धन ही हर बार क्यों ठगा जाता,
अबोध,अशिछित कुछ पाने को,दांव पर दांव लगा जाता!
पाप-कर्म हेतु यह सफ़ेद-पोश, क्या कुछ कम हैं ?
जो तुम जोगी-वस्त्र पहन,बढा रहे उनका क्रम हैं!
दासी-प्रथा को कर समाप्त, आश्रम अब खोल लिये हैं,
नारी का शोषण करनेहेतु, अब यह ठेके खोल दिये हैं!
धर्म-जाति के ठेकेदारो , मानव का शोषण अब बन्द करो,
कुछ परहित का भी सोचो ,और सेवा उनकी स्वछंद करो !
अब टीवी -अख्बारों से भी , यह कर रहे अपना प्रचार,
ऎसा लगता मानो बेच रहे हों,पापड,चट्नी और अचार!
सत्य-अहिंसा का सुबह-सुबह, जो तुम पाठ पढाते हो,
पर गद्दी से उठ कर कभी, उस पर अमल कर पाते हो!
"ये ही हमारा कर्म है",सबको यही तुम बतलाते हो,
अरबों की इनकम कर, क्यों इनकम-टैक्स बचातेहो?
इन्कम -टैक्स बचाने को, बैठे हैं यह धनवानों के दलाल,
दान-पात्र मै बटोर कर रहे , काला धन उनका ये लाल !
जिस दिन इन्कम-टैक्स ऎक्ट से,चैरिटी प्रावधान हट जाएगा,
फ़िर कोई साधू कभी, पैत्रक-समपत्ति सेआश्रम नही चलायेगा!
कभी सुनी कि गुरुकुल् मे तन्त्र-क्रियाहेतु,शिष्य बलि चढाई गई,
कभी पत्नी का श्राध कर, नारी और नन्हों की बलि चढाई गई !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकदंरा आगरा२८२००७



बुधवार, 17 मार्च 2010

माया की माया


२०० करोड की भीम नगरीऔर ५ करोड की माला,
मायावती ने किया,आज प्रजातन्त्र का मुंह काला !
लगता है जनसेवक नही,उनके नाम पर अभिशाप है,
दलितों की बातें करती है,पर राजाओं की भी बाप है!
३००० शौचालय लख्ननउ भीम नगरी में बनवाए गए,
और दलितों को कितने ही,स्वप्न-सलोने दिखाए गए!
दलितों को खेतों और सड्कों पर शौच करना पड्ता है,
स्वास्थ से उनके खिलवाड -घूरा उनके द्वार पर सड्ता है!
काश कोई उनकी समस्याओं को उनकी नज़र से देखता,
हर दल दलित वोट बैंक हथिया उस पर रोटी नही सेकता!
समस्याओं को छोड,हर कोई,अपनी-अपनी झोली भर रहा है,
कहांसे आता है इतना पैसा?,बताने से भी हर कोई डर रहाहै!
गरीब दो वक्त की रोटीके लिये ,क्या क्या जुगाड करता है,
तब कहीं जाकर कहीं उसके परिवार और उसका पेट भरता है!
आज उनके रहनुमा ,अगर जरा भी उनकी चिन्ता करते,
तो आज फ़िर कलुआ या कमला,आत्म-हत्या नही करते!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

होली

होलिका का हो दहन ,
भक्त प्रह्लाद का हो स्मरण !
हिरण्य कश्यप का हो मान- मर्दन ,
चारों ओर हो रहा हुरियारों का क्रंदन !
रंगों से सराबोर हो तन-मन ,
झूम उठी बगिया और चमन !
है येही नव संवत्सर का अभिनन्दन'!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा agraa282007

Thank You from 123Greetings

Thank You from 123Greetings

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

क्यों बनाया रिश्ता ?



क्यों बनाया उसने रिश्ता ,हमे भुलाने को ?


बरस बीस जाया किये,उसे अपना बनाने को !!


वो भी क्या दिन थे,फ़क़त लुभाने को !


कांधेका दिया सहारा,हमे सुलाने को !!क्यों ..........


एक दर्द दे दिया ,हमे रुलाने को !


ता ज़िंदगी कोशिश किये, उसे भुलाने को !! क्यों ........


मोहब्बत -औ- गम हमारे,मज़ा आ रहा ज़माने को !


हो चूका यह मज्हनू ,पत्थर से मरो इस दीवाने को !! क्योँ .......


इस ज़िन्दगी में हैं ,कई गम बताने को !


लोग आते हे सिर्फ ,हसने या फिर रुलाने को !!क्यों .........


उसने तो चुटकी में किया ,किनारा हमे सताने को!


हमने छुपाली दास्ताने -मोहब्बत,गुनगुनाने को !! क्यों......


अँधेरा बहुत किया ,उसने हमे डराने को !


हमने किये हैं चिरागां रौशन ,फिर दिवाली मनाने को !! क्यों.....


बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

जिंदगी

ऊबड़- खाबड़ रास्तों पर चलना ही तो ज़िन्दगी है !
तहे दिल से करे कोई सिजदा ,वही तो बंदगी है !!
गमे-राहमें कोई यूंही मिले, और गर बिछुड़ जाये !
फिर उससे मिलने को दिल करे,येही तो तिस्नगी है !!ऊबड़ -खाबड़ ........
राह में साथ चलने की गुज़ारिश करते हैं लाखों ,
पर चंद कदम साथ चलकर ,मुड जाये ,येही तो दिल्लगी है !! ऊबड़ -खाबड़ ......
प्यार करने को बांह में भर ले ,चूम ले -गिला नहीं !
पर प्यार में व्यभिचार करे ,यह ही तो दरिंदगी है !!ऊबड़- खाबड़ .......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा agra282007

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

राजनीती

पहले हम धर्म-जाति,भाषा के नाम पर बंट रहे थे !
अब अपने स्वतंत्र भारत में ,प्रांतीयता के नाम बंट रहे हैं !!
इधर तो हम दशहरे पर ,गली मोहल्ले में रावण जला रहेहें !
पर raj ठाकरे सरीखे रावण ,राजनीती ki दूकान चला रहे हैं !!
क्या दीपावली par आप,, दीप प्रज्ज्वलित कर संतुष्ट हैं ?
जो लोग औरों के घर जला रहे हैं ,वे कितने दुष्ट हैं !!
हाय राजनीती कितनी ,बौनी और ओछी हो गई !
धर्म,संस्क्रति और प्रांतीयता से यह छोछी ho गई !!
बोधसत्व कस्तूरिया 202 नीरव निकुंज सिकंदरा २८२००७

रविवार, 24 जनवरी 2010

गणतंत्र


गणतंत्र की कहानी ,तुमको है सुनानी !

स्वतंत्रता की गाथा ,आगे थी बढ़ानी !!

बिन संविधान,होती रहेगी मनमानी !

इसलिए संविधान की,ज़रुरत थी आनी !!

छोटे-छोटे राज्यों की,पहचान थी मिटानी !

एक गणतंत्र बनाने की, सबने थी ठानी !!

अन्य देशों के ,संविधानों का निचोड़ा पानी !

भारतीय संविधान की,छवि उभर के मानी!!

मूल अधिकारों ,नीति-निर्देशक सिद्धांत की,

मंजिल हमको , हर हाल में है पानी !!

स्वंतंत्रता,समानता,सदभाव का बहेगा निर्मल पानी !

सम्रेद्ध ,सुद्रढ़ भारत की ,छवि विश्व में है बनानी !!

२६ जनवरी १९५० को कर संविधान लागू !

नव भारत के निर्माण की लौ थी जलानी !!

बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

गुरुवार, 21 जनवरी 2010

वसंत



आज भी याद है मुझको मां,तेरा वसंत पंचमी मनाना !


उषा से साँझ तक ,मां सरस्वती के भाज़न गुनगुनाना !!


करती थी तू सरस्वती के ,महा श्रृंगार की तय्यारी !


कभी पुष्पमाला बनाना, कभी रोरी टीका लगाना !! आज भी याद .........


इस पावन पर्व पर ,पुस्तकों को हम पूजते थे !


मां सरस्वती को समर्पण कर ,प्रसाद लगाना !! आज भी याद ........


वासंती -वस्त्र धारण कर ,पुस्तकें रखते उसके समक्ष !


वंदना थी -कर कृपा ताकि पंहुंचे शीघ्र अगले कक्ष !! आज भी याद ......


पर अब न तू है, न वैसा वासंती वसंत !


छोड़ हमको विलीन हो गई ,पा गई अनंत !! आज भी याद ..........


बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिउकंदरा आगरा २८२००७