गुरुवार, 30 दिसंबर 2010
नव वर्ष
मंगलवार, 21 दिसंबर 2010
इश्क के चर्चे
गुरुवार, 16 दिसंबर 2010
धरा की धरोहर
रविवार, 5 दिसंबर 2010
जीवन एक मकान किराये का
या जीवन मे आना है एक मानी,
सोमवार, 29 नवंबर 2010
समाज
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
बेटी का बाप
मंगलवार, 9 नवंबर 2010
कैसो सुन्दर सासरो?
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
मंगलवार, 2 नवंबर 2010
सोमवार, 1 नवंबर 2010
दीवाली
क्यों नीँद से जगा दिया ?
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
चौबन की छोरी !
मैं उनके लिये दूल्हा,वो मेरे लिये दुल्हन देखा करती!
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
शरद पूर्णिमा
सोमवार, 18 अक्टूबर 2010
दर्द की दास्तान
शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010
सपन
कब सवेरा होगा ?
जनता घोड़े बेच सो रही,जब होगा तब होगा !
दिनोदिन संगीन के साए बढ़ते जा रहे ,
जैसे फल ,सब्जी ,दाल के भाव चढ़ते जारहे !
सियासत में तो सब चोर से ही लगते हैं ,
खिलाफत में हैं तो कमज़ोर से ही लगते हैं !
अब तो न तू कह मेरी ,न में कहूं तेरी ,
देखना जल्द आयेगी एकदिन ,फिर सुबह मेरी !
या रब भले लोगों का भी क्या कोई दिन होगा ?
चुप बैठ ऐ दिल रात ही सा सही वो दिन होगा !
मुझे किसी और से ऐ ज़नाब क्या लेना ?
अगली पीढी को फिर भी कुछ हिसाब है देना !
जो है ज़रा भी पानीदार ,वो शर्मसार हैं ,
जिन्हें शर्म ही नहीं आती ,वो गद्दार हैं !
बुजुर्गों ने कहा ,"जब जागो तब सवेरा है"
जागे तब कौन जब चारो ओर ही अंधेरा है !
गुरुवार, 30 सितंबर 2010
फैसला
बुधवार, 29 सितंबर 2010
बौस छुट्टी पर है?
किसी के घर खुशी,
किसी के घर रोना है ! आज फ़िर कुछ....
सुबह से इसी उधेड बुन मे,
कभी कुछ भूल जाता हूं,
पर आफ़िस पहुंच,
खुशी से फ़ूल जाता हूं! आज फ़िर कुछ....
आज बौस छ्ट्टी पर है,
कमैन्ट्री सुनेगे ,सर्फ़िगं करेंगे!
किसी छोरी से छोरी,
बन ढेर सारी बातें करेंगे! आज फ़िर कुछ.....
प्रेम की पींगे बढेंगी,
पर क्या पता उधर भी
गुरुवार, 23 सितंबर 2010
राम- जुहार
बुधवार, 22 सितंबर 2010
kisaan
रुलाई आई नही!!
कभी सूखे ने,
फ़सल तबाह कर दी!
कभी बाढ ने
बिल्कुल स्वाह कर दी!!
अब बात खेतों के ,
अधिग्रहण की है !
जीवन पर लगने वाले
पूर्ण ग्रहण की है!!
इसीलिये रोने के बज़ाय,
लाठी उसने उठाई है!
प्रजातन्त्र मे भी,
शासक-शासित मे
कितनी बडी खाई है!!
शासक तो करोडों से
महल बना रहा है!
शसित पुश्तैनी ज़ायदाद
के लिये अपना खून बहा रहा है!!
वैसे हमारे देश मे,
प्रजातान्त्रिक सरकार है!
सम्पत्ति हमारा मौलिक अधिकार है!
इसीलिये विकास के नाम पर,
गरीबों पर पड रही मार है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
शनिवार, 18 सितंबर 2010
दर्द
मंगलवार, 8 जून 2010
लेखनी
यह लेखनी मेरी यू ही कभी रुकती नही!
अनाचारी,आतताईयो के आगे कभी झुकती नही!!
कभी यह डल झील सी शांत और निढाल है,
तो क्भी इसमे ज्वालामुखी सा उबाल है!
ऊपर से शांत हो ,आग भीतर की कभी बुझती नही!! यह लेखनी.........
प्यार की पींगे भरती है यह कभी,
विरहणी की तरह तपती है यह कभी!
नियति के निर्बाध क्रम् से यह कभी थकती् नही!! यह लेखनी.....
इतिहास के दर्द् को अंक मे समेटे हुए,
मानव-मूल्यो की शर-शैया पर लेटे हुए!
प्रतिकार की फ़ुंकार फ़िर भी कभी रुकती नही !! यह लेखनी.......
धर्म और सस्कारो की अवधारणा सी,
गुरु और पित्र की सबल प्रताड्ना सी!
नित नये परिवर्तनो से कभी यह डरती नही!! यह लेखनी .......
सरस्वती का है निमंत्रण"कभी निस्तेज़ होना नही",
किसी भी रंग मे रंगकर, खुद रंगरेज़ होना नही!
समाज का अंकुश है यह,समय की धुरी कभी रुकती नही!!यह लेखनी.......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा २८२००७
गुरुवार, 27 मई 2010
maanav muly
संस्क्रति सिसकतीहै,और तभी वतन रोता है!
जब नारी- मां,बहन और बेटी हुआ करती थी,
तब मां भी घर में, बेटी होने की दुआ करती थी!
अब बेटी को हम ,जीन्स-पैन्ट पहन डुलाते हैं,
और बेटी को बेटा बनाने का, khud मुकुट लगाते हैं !
वस्त्रों से स्तन-उरोज़ दिखा कर,यौन-निमन्त्रण करते हैं,
इसीलिये पथ पर ही,दुशासन रोज़ चीर-हरण करते हैं!
आज बहू-बेटी संग बैठ ,टीवी पर उत्तेजक चित्रपट देख रहे
,अपनी संस्क्रति को दे तिलांजलि ,पाश्चात्य को सहेज़ रहे!
कथ्थक,भरत-नाट्यम भुला, मम्मी कामुक-नर्तन सिखा रही,
बेटी को धन-कुबेर बनने का,दिवा-स्वप्न भी हैं दिखा रही!
समाचार पढा- श्वसुर बहू संग ,रोज़ बलात्कार करता है,
धिक्कार है! क्यों नही उसका अन्तस चीत्कार करता है?
बहन-भाई के रिश्ते में भी, अब व्याभिचार हो रहा है,
पता नही कब कहां,मानव-मूल्यों का तिरस्कार हो है !
पता नही क्यों ? हम चर्चा कर रहे इस अभिशाप की,
हो सकती है यह घट्ना घर मेरे, या फ़िर आप की !
वे कह्ते हैं -"हर युग में ऐसा होता रहा है,
मानव पशु-कर्म करे,और भगवन सोता रहा है!
वो कहती -"अजी चुप बैठिये !आपकी उम्र का तकाज़ा
हैसमय-सारथी संग चल रहे हैं, उसी ने यह हमें नवाज़ा है!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरवनिकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७१६-३-१०SAMVEDNA
सफ़र
९४१२४४३०९३
ज़िन्दगी के सफ़र मे जाने कौन कब जुड जाता है ?
दो कदम साथ चल कर न जाने कब बिछुड जाता है?
मिलने-बिछुड्ने का समय ,पहले से सुनिश्चित होता है!
पता नही फ़िर क्यों यह दिल, बिछुड्ने पर यूं रोता है?
प्रीति की यही रीति है,मिलन- वियोग अव्श्यम्भावी है !
कभी प्रीत की जीत मे खुशी, कभी हार का दर्द हावी है!!
मैने सर्द रातों मे प्यार के दर्द को कई बार झेला है !
कभी हर पल का साथ था,आज बिल्कुल अकेला है !!
सब जानते हैं साथ चलने की कसम,सरासर झूठी है!
कभी मै उससे रूठा नही,पर आज़ वो मुझसे रूठी है !!
फ़िर क्यों लोग बेवज़ह, साथ चलने की कसम खाते है?
करते है बार -बार वादा, खुद ही वादे से मुकर जाते है!!
जब वो वादा तोडते है, सच भीतर बडी तकलीफ़ होती है!
कभी चुपचाप दिल रोता है ,तो कभी आंख नम होती है!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
रविवार, 9 मई 2010
मां तुझे प्रणाम

इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
सोमवार, 19 अप्रैल 2010
soory
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अब तो मानव तुमसे,तुमको चुराने चला है!
ऊर्जा का श्रोत तुम, तुम्हे ही मिटाने चला है!!
मानव ने सदैव से ही,प्रक्रति को छला है!
अस्तित्व पर घात करता, भई वाह क्या बला है?
ऊर्जा का कर रहा दोहन,विकास से ही पला है !!
प्रक्रति को मिटाना भी, इसकी एक कला है?
पहले पेड-पौधो से ही,इसका चूल्हा जला है!!
फ़िर धरती के सीने से कोयला-तेल मिला है!
खत्म कर सभी को,अब सौर-ऊर्जा पर पिला है!!
अपनी भूख की खातिर, फ़िर प्रक्रति को तला है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७
शनिवार, 17 अप्रैल 2010
किस्मत वाले
उनकी सुबह आम सही ,पर रात तो उनकी खास होती है !
उन्हें दूरियों का अहसास ,क्योंकर नहीं होता है ?
गम कोइ भी हो लेकिन,दिल कभी नहीं रोता है !
किसी गम या दर्द का,उनको कभी अहसास होता नहीं !
अपना कोइ पल किसी के,इंतज़ार में वो खोता नहीं !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007
शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010
yaade
साम्प्रदायिक सदभाव ---------------------
गुरुवार, 1 अप्रैल 2010
tee vee
बुधवार, 31 मार्च 2010
रिश्ते-नाते
kadachaar
बुधवार, 17 मार्च 2010
माया की माया

मायावती ने किया,आज प्रजातन्त्र का मुंह काला !
लगता है जनसेवक नही,उनके नाम पर अभिशाप है,
दलितों की बातें करती है,पर राजाओं की भी बाप है!
३००० शौचालय लख्ननउ भीम नगरी में बनवाए गए,
और दलितों को कितने ही,स्वप्न-सलोने दिखाए गए!
दलितों को खेतों और सड्कों पर शौच करना पड्ता है,
स्वास्थ से उनके खिलवाड -घूरा उनके द्वार पर सड्ता है!
काश कोई उनकी समस्याओं को उनकी नज़र से देखता,
हर दल दलित वोट बैंक हथिया उस पर रोटी नही सेकता!
समस्याओं को छोड,हर कोई,अपनी-अपनी झोली भर रहा है,
कहांसे आता है इतना पैसा?,बताने से भी हर कोई डर रहाहै!
गरीब दो वक्त की रोटीके लिये ,क्या क्या जुगाड करता है,
तब कहीं जाकर कहीं उसके परिवार और उसका पेट भरता है!
आज उनके रहनुमा ,अगर जरा भी उनकी चिन्ता करते,
तो आज फ़िर कलुआ या कमला,आत्म-हत्या नही करते!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010
होली
भक्त प्रह्लाद का हो स्मरण !
हिरण्य कश्यप का हो मान- मर्दन ,
चारों ओर हो रहा हुरियारों का क्रंदन !
रंगों से सराबोर हो तन-मन ,
झूम उठी बगिया और चमन !
है येही नव संवत्सर का अभिनन्दन'!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा agraa282007
रविवार, 21 फ़रवरी 2010
क्यों बनाया रिश्ता ?

क्यों बनाया उसने रिश्ता ,हमे भुलाने को ?
बरस बीस जाया किये,उसे अपना बनाने को !!
वो भी क्या दिन थे,फ़क़त लुभाने को !
कांधेका दिया सहारा,हमे सुलाने को !!क्यों ..........
एक दर्द दे दिया ,हमे रुलाने को !
ता ज़िंदगी कोशिश किये, उसे भुलाने को !! क्यों ........
मोहब्बत -औ- गम हमारे,मज़ा आ रहा ज़माने को !
हो चूका यह मज्हनू ,पत्थर से मरो इस दीवाने को !! क्योँ .......
इस ज़िन्दगी में हैं ,कई गम बताने को !
लोग आते हे सिर्फ ,हसने या फिर रुलाने को !!क्यों .........
उसने तो चुटकी में किया ,किनारा हमे सताने को!
हमने छुपाली दास्ताने -मोहब्बत,गुनगुनाने को !! क्यों......
अँधेरा बहुत किया ,उसने हमे डराने को !
हमने किये हैं चिरागां रौशन ,फिर दिवाली मनाने को !! क्यों.....
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007
बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
जिंदगी
तहे दिल से करे कोई सिजदा ,वही तो बंदगी है !!
गमे-राहमें कोई यूंही मिले, और गर बिछुड़ जाये !
फिर उससे मिलने को दिल करे,येही तो तिस्नगी है !!ऊबड़ -खाबड़ ........
राह में साथ चलने की गुज़ारिश करते हैं लाखों ,
पर चंद कदम साथ चलकर ,मुड जाये ,येही तो दिल्लगी है !! ऊबड़ -खाबड़ ......
प्यार करने को बांह में भर ले ,चूम ले -गिला नहीं !
पर प्यार में व्यभिचार करे ,यह ही तो दरिंदगी है !!ऊबड़- खाबड़ .......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा agra282007
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010
राजनीती
अब अपने स्वतंत्र भारत में ,प्रांतीयता के नाम बंट रहे हैं !!
इधर तो हम दशहरे पर ,गली मोहल्ले में रावण जला रहेहें !
पर raj ठाकरे सरीखे रावण ,राजनीती ki दूकान चला रहे हैं !!
क्या दीपावली par आप,, दीप प्रज्ज्वलित कर संतुष्ट हैं ?
जो लोग औरों के घर जला रहे हैं ,वे कितने दुष्ट हैं !!
हाय राजनीती कितनी ,बौनी और ओछी हो गई !
धर्म,संस्क्रति और प्रांतीयता से यह छोछी ho गई !!
बोधसत्व कस्तूरिया 202 नीरव निकुंज सिकंदरा २८२००७
रविवार, 24 जनवरी 2010
गणतंत्र

गुरुवार, 21 जनवरी 2010
वसंत

आज भी याद है मुझको मां,तेरा वसंत पंचमी मनाना !
उषा से साँझ तक ,मां सरस्वती के भाज़न गुनगुनाना !!
करती थी तू सरस्वती के ,महा श्रृंगार की तय्यारी !
कभी पुष्पमाला बनाना, कभी रोरी टीका लगाना !! आज भी याद .........
इस पावन पर्व पर ,पुस्तकों को हम पूजते थे !
मां सरस्वती को समर्पण कर ,प्रसाद लगाना !! आज भी याद ........
वासंती -वस्त्र धारण कर ,पुस्तकें रखते उसके समक्ष !
वंदना थी -कर कृपा ताकि पंहुंचे शीघ्र अगले कक्ष !! आज भी याद ......
पर अब न तू है, न वैसा वासंती वसंत !
छोड़ हमको विलीन हो गई ,पा गई अनंत !! आज भी याद ..........
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिउकंदरा आगरा २८२००७

















