मंगलवार, 8 जून 2010

लेखनी

लेखनी
यह लेखनी मेरी यू ही कभी रुकती नही!
अनाचारी,आतताईयो के आगे कभी झुकती नही!!
कभी यह डल झील सी शांत और निढाल है,
तो क्भी इसमे ज्वालामुखी सा उबाल है!
ऊपर से शांत हो ,आग भीतर की कभी बुझती नही!! यह लेखनी.........
प्यार की पींगे भरती है यह कभी,
विरहणी की तरह तपती है यह कभी!
नियति के निर्बाध क्रम् से यह कभी थकती् नही!! यह लेखनी.....
इतिहास के दर्द् को अंक मे समेटे हुए,
मानव-मूल्यो की शर-शैया पर लेटे हुए!
प्रतिकार की फ़ुंकार फ़िर भी कभी रुकती नही !! यह लेखनी.......
धर्म और सस्कारो की अवधारणा सी,
गुरु और पित्र की सबल प्रताड्ना सी!
नित नये परिवर्तनो से कभी यह डरती नही!! यह लेखनी .......
सरस्वती का है निमंत्रण"कभी निस्तेज़ होना नही",
किसी भी रंग मे रंगकर, खुद रंगरेज़ होना नही!
समाज का अंकुश है यह,समय की धुरी कभी रुकती नही!!यह लेखनी.......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकन्दरा आगरा २८२००७