मानव मूल्यों का, जब कभी पतन होता है,
संस्क्रति सिसकतीहै,और तभी वतन रोता है!
जब नारी- मां,बहन और बेटी हुआ करती थी,
तब मां भी घर में, बेटी होने की दुआ करती थी!
अब बेटी को हम ,जीन्स-पैन्ट पहन डुलाते हैं,
और बेटी को बेटा बनाने का, khud मुकुट लगाते हैं !
वस्त्रों से स्तन-उरोज़ दिखा कर,यौन-निमन्त्रण करते हैं,
इसीलिये पथ पर ही,दुशासन रोज़ चीर-हरण करते हैं!
आज बहू-बेटी संग बैठ ,टीवी पर उत्तेजक चित्रपट देख रहे
,अपनी संस्क्रति को दे तिलांजलि ,पाश्चात्य को सहेज़ रहे!
कथ्थक,भरत-नाट्यम भुला, मम्मी कामुक-नर्तन सिखा रही,
बेटी को धन-कुबेर बनने का,दिवा-स्वप्न भी हैं दिखा रही!
समाचार पढा- श्वसुर बहू संग ,रोज़ बलात्कार करता है,
धिक्कार है! क्यों नही उसका अन्तस चीत्कार करता है?
बहन-भाई के रिश्ते में भी, अब व्याभिचार हो रहा है,
पता नही कब कहां,मानव-मूल्यों का तिरस्कार हो है !
पता नही क्यों ? हम चर्चा कर रहे इस अभिशाप की,
हो सकती है यह घट्ना घर मेरे, या फ़िर आप की !
वे कह्ते हैं -"हर युग में ऐसा होता रहा है,
मानव पशु-कर्म करे,और भगवन सोता रहा है!
वो कहती -"अजी चुप बैठिये !आपकी उम्र का तकाज़ा
हैसमय-सारथी संग चल रहे हैं, उसी ने यह हमें नवाज़ा है!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरवनिकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७१६-३-१०SAMVEDNA
गुरुवार, 27 मई 2010
सफ़र
सफ़र
९४१२४४३०९३
ज़िन्दगी के सफ़र मे जाने कौन कब जुड जाता है ?
दो कदम साथ चल कर न जाने कब बिछुड जाता है?
मिलने-बिछुड्ने का समय ,पहले से सुनिश्चित होता है!
पता नही फ़िर क्यों यह दिल, बिछुड्ने पर यूं रोता है?
प्रीति की यही रीति है,मिलन- वियोग अव्श्यम्भावी है !
कभी प्रीत की जीत मे खुशी, कभी हार का दर्द हावी है!!
मैने सर्द रातों मे प्यार के दर्द को कई बार झेला है !
कभी हर पल का साथ था,आज बिल्कुल अकेला है !!
सब जानते हैं साथ चलने की कसम,सरासर झूठी है!
कभी मै उससे रूठा नही,पर आज़ वो मुझसे रूठी है !!
फ़िर क्यों लोग बेवज़ह, साथ चलने की कसम खाते है?
करते है बार -बार वादा, खुद ही वादे से मुकर जाते है!!
जब वो वादा तोडते है, सच भीतर बडी तकलीफ़ होती है!
कभी चुपचाप दिल रोता है ,तो कभी आंख नम होती है!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
९४१२४४३०९३
ज़िन्दगी के सफ़र मे जाने कौन कब जुड जाता है ?
दो कदम साथ चल कर न जाने कब बिछुड जाता है?
मिलने-बिछुड्ने का समय ,पहले से सुनिश्चित होता है!
पता नही फ़िर क्यों यह दिल, बिछुड्ने पर यूं रोता है?
प्रीति की यही रीति है,मिलन- वियोग अव्श्यम्भावी है !
कभी प्रीत की जीत मे खुशी, कभी हार का दर्द हावी है!!
मैने सर्द रातों मे प्यार के दर्द को कई बार झेला है !
कभी हर पल का साथ था,आज बिल्कुल अकेला है !!
सब जानते हैं साथ चलने की कसम,सरासर झूठी है!
कभी मै उससे रूठा नही,पर आज़ वो मुझसे रूठी है !!
फ़िर क्यों लोग बेवज़ह, साथ चलने की कसम खाते है?
करते है बार -बार वादा, खुद ही वादे से मुकर जाते है!!
जब वो वादा तोडते है, सच भीतर बडी तकलीफ़ होती है!
कभी चुपचाप दिल रोता है ,तो कभी आंख नम होती है!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
रविवार, 9 मई 2010
मां तुझे प्रणाम

इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
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