गुरुवार, 27 मई 2010

maanav muly

मानव मूल्यों का, जब कभी पतन होता है,
संस्क्रति सिसकतीहै,और तभी वतन रोता है!
जब नारी- मां,बहन और बेटी हुआ करती थी,
तब मां भी घर में, बेटी होने की दुआ करती थी!
अब बेटी को हम ,जीन्स-पैन्ट पहन डुलाते हैं,
और बेटी को बेटा बनाने का, khud मुकुट लगाते हैं !
वस्त्रों से स्तन-उरोज़ दिखा कर,यौन-निमन्त्रण करते हैं,
इसीलिये पथ पर ही,दुशासन रोज़ चीर-हरण करते हैं!
आज बहू-बेटी संग बैठ ,टीवी पर उत्तेजक चित्रपट देख रहे
,अपनी संस्क्रति को दे तिलांजलि ,पाश्चात्य को सहेज़ रहे!
कथ्थक,भरत-नाट्यम भुला, मम्मी कामुक-नर्तन सिखा रही,
बेटी को धन-कुबेर बनने का,दिवा-स्वप्न भी हैं दिखा रही!
समाचार पढा- श्वसुर बहू संग ,रोज़ बलात्कार करता है,
धिक्कार है! क्यों नही उसका अन्तस चीत्कार करता है?
बहन-भाई के रिश्ते में भी, अब व्याभिचार हो रहा है,
पता नही कब कहां,मानव-मूल्यों का तिरस्कार हो है !
पता नही क्यों ? हम चर्चा कर रहे इस अभिशाप की,
हो सकती है यह घट्ना घर मेरे, या फ़िर आप की !
वे कह्ते हैं -"हर युग में ऐसा होता रहा है,
मानव पशु-कर्म करे,और भगवन सोता रहा है!
वो कहती -"अजी चुप बैठिये !आपकी उम्र का तकाज़ा
हैसमय-सारथी संग चल रहे हैं, उसी ने यह हमें नवाज़ा है!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरवनिकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७१६-३-१०SAMVEDNA

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