रविवार, 9 मई 2010

मां तुझे प्रणाम


इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७
इस रूप मे नारी कितनी सुन्दर दिखती है,
जब नन्ही बेटी तखती पर मां लिखती है!
गर्भ मे उसने ही हमको कितने नाज़ो से पाला है
भूल गई कि अभी तो वो एक कमसिन बाला है!
धक्का लगने से बचाने को हौले से रुक जातीहै,
भूल जाती है कब बेटी से वो मां बन जाती है?
तेरी इस इस ममता पर यह मानवता बलिहारी,
अब तक दे दिये इसको तूने कितने नर-नारी?
पर कोई कर नही पाया तेरी ममता को बयां,
प्यार-दुलार को छुपा कर तू रखती है कहां ?
एक दिन मे,नही कर सकते तेरे कर्ज़ का बखान
क्यो नही होती अब हर सुबह तेरी झिड्की बयान!
मां तेरी इस सादगी और संज़ीदगी को सलाम,
मां तुझे प्रणाम लाखो बार मां तुझे प्रणाम !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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