सोमवार, 19 अप्रैल 2010

soory

सूर्य
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अब तो मानव तुमसे,तुमको चुराने चला है!
ऊर्जा का श्रोत तुम, तुम्हे ही मिटाने चला है!!
मानव ने सदैव से ही,प्रक्रति को छला है!
अस्तित्व पर घात करता, भई वाह क्या बला है?
ऊर्जा का कर रहा दोहन,विकास से ही पला है !!
प्रक्रति को मिटाना भी, इसकी एक कला है?
पहले पेड-पौधो से ही,इसका चूल्हा जला है!!
फ़िर धरती के सीने से कोयला-तेल मिला है!
खत्म कर सभी को,अब सौर-ऊर्जा पर पिला है!!
अपनी भूख की खातिर, फ़िर प्रक्रति को तला है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७

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