बुधवार, 31 मार्च 2010

रिश्ते-नाते

कंक्रीट के इन जंगलोंमें सूर्य कहीं दिखता नहीं,
भ्रम हो्ता है कि कभी उगता है, या उगता नही!
तितली और भ्रमर , कभी इधर गुन्जन करते नही,
नन्हों के चित्रों में ,इसीलिये कभी ये उभरते नहीं !’
चन्दा की चौदह कलाएं,समझ इन्हे आती नही ,
मल्टीस्टोरीड में रौशनी,इसकी कभी आती नही!
दादा-दादी से इन्होने,कहानी कोई कभीसुनी नही,
क्योंकि मां-बाप से ज़्यादा कोई और गुनी नही !
मां ने जिसे कपडे ,सिल- सिल कर पाला है,
उसीकी आवाज़ आज,कोई नही सुनने वाला है!
जिस मां ने चूल्हा फ़ूंक-फ़ूंक रोटी पकाई थी,
आज अपने ही घर मे,हो गई वोही पराई सी!
घर में ही वो ,कदम फ़ूंक-फ़ूंक कर धरती है,
क्योंकि हर आहट पर,डांट उसी पर पडती है!
इन बहु-मन्ज़िली भवनोमें,कौन किसे ढोता है,
पडोसी की गमी पर,पडोसी कोई नही रोता है!
यह नई सभ्यता,समय और नये संस्कार हैं,
रिश्ते-नाते नींव मे दबे,युवाओं के विचार हैं!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा २८२००७

kadachaar

कदाचार
आज कहां गये वो साधू-सन्त और वैरागी?
कहां वो गये परम-हंस,शिरडी साईंसे त्यागी!
बडे-बडे मठाधीश,और मंह्त बने फ़िरते हैं,
सत्ता-सम्पत्ति हेतु, अबलाओं को ठ्गते फ़िरते हैं!
अभिशाप बने यह,प्रथ्वी पर संताप जगाते हैं,
दीन-हीन को दुतकार,धनवानों को गले लगाते हैं!
मंदिर-मस्ज़िद,गुरुद्वारे,अब केवल धन से चलते हैं,
निष्काम भाव नही है,छल-बल के मदसे पलते हैं!
धर्म -कर्म् के नाम से ,यह अपनी दूकान लगा बैठे है,
सत्ता-धारियों के समकछ, समपत्ति बटोर यह ऎठे हैं !
समझ नही मै पाता,निर्धन ही हर बार क्यों ठगा जाता,
अबोध,अशिछित कुछ पाने को,दांव पर दांव लगा जाता!
पाप-कर्म हेतु यह सफ़ेद-पोश, क्या कुछ कम हैं ?
जो तुम जोगी-वस्त्र पहन,बढा रहे उनका क्रम हैं!
दासी-प्रथा को कर समाप्त, आश्रम अब खोल लिये हैं,
नारी का शोषण करनेहेतु, अब यह ठेके खोल दिये हैं!
धर्म-जाति के ठेकेदारो , मानव का शोषण अब बन्द करो,
कुछ परहित का भी सोचो ,और सेवा उनकी स्वछंद करो !
अब टीवी -अख्बारों से भी , यह कर रहे अपना प्रचार,
ऎसा लगता मानो बेच रहे हों,पापड,चट्नी और अचार!
सत्य-अहिंसा का सुबह-सुबह, जो तुम पाठ पढाते हो,
पर गद्दी से उठ कर कभी, उस पर अमल कर पाते हो!
"ये ही हमारा कर्म है",सबको यही तुम बतलाते हो,
अरबों की इनकम कर, क्यों इनकम-टैक्स बचातेहो?
इन्कम -टैक्स बचाने को, बैठे हैं यह धनवानों के दलाल,
दान-पात्र मै बटोर कर रहे , काला धन उनका ये लाल !
जिस दिन इन्कम-टैक्स ऎक्ट से,चैरिटी प्रावधान हट जाएगा,
फ़िर कोई साधू कभी, पैत्रक-समपत्ति सेआश्रम नही चलायेगा!
कभी सुनी कि गुरुकुल् मे तन्त्र-क्रियाहेतु,शिष्य बलि चढाई गई,
कभी पत्नी का श्राध कर, नारी और नन्हों की बलि चढाई गई !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकदंरा आगरा२८२००७



बुधवार, 17 मार्च 2010

माया की माया


२०० करोड की भीम नगरीऔर ५ करोड की माला,
मायावती ने किया,आज प्रजातन्त्र का मुंह काला !
लगता है जनसेवक नही,उनके नाम पर अभिशाप है,
दलितों की बातें करती है,पर राजाओं की भी बाप है!
३००० शौचालय लख्ननउ भीम नगरी में बनवाए गए,
और दलितों को कितने ही,स्वप्न-सलोने दिखाए गए!
दलितों को खेतों और सड्कों पर शौच करना पड्ता है,
स्वास्थ से उनके खिलवाड -घूरा उनके द्वार पर सड्ता है!
काश कोई उनकी समस्याओं को उनकी नज़र से देखता,
हर दल दलित वोट बैंक हथिया उस पर रोटी नही सेकता!
समस्याओं को छोड,हर कोई,अपनी-अपनी झोली भर रहा है,
कहांसे आता है इतना पैसा?,बताने से भी हर कोई डर रहाहै!
गरीब दो वक्त की रोटीके लिये ,क्या क्या जुगाड करता है,
तब कहीं जाकर कहीं उसके परिवार और उसका पेट भरता है!
आज उनके रहनुमा ,अगर जरा भी उनकी चिन्ता करते,
तो आज फ़िर कलुआ या कमला,आत्म-हत्या नही करते!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७