कदाचार
आज कहां गये वो साधू-सन्त और वैरागी?
कहां वो गये परम-हंस,शिरडी साईंसे त्यागी!
बडे-बडे मठाधीश,और मंह्त बने फ़िरते हैं,
सत्ता-सम्पत्ति हेतु, अबलाओं को ठ्गते फ़िरते हैं!
अभिशाप बने यह,प्रथ्वी पर संताप जगाते हैं,
दीन-हीन को दुतकार,धनवानों को गले लगाते हैं!
मंदिर-मस्ज़िद,गुरुद्वारे,अब केवल धन से चलते हैं,
निष्काम भाव नही है,छल-बल के मदसे पलते हैं!
धर्म -कर्म् के नाम से ,यह अपनी दूकान लगा बैठे है,
सत्ता-धारियों के समकछ, समपत्ति बटोर यह ऎठे हैं !
समझ नही मै पाता,निर्धन ही हर बार क्यों ठगा जाता,
अबोध,अशिछित कुछ पाने को,दांव पर दांव लगा जाता!
पाप-कर्म हेतु यह सफ़ेद-पोश, क्या कुछ कम हैं ?
जो तुम जोगी-वस्त्र पहन,बढा रहे उनका क्रम हैं!
दासी-प्रथा को कर समाप्त, आश्रम अब खोल लिये हैं,
नारी का शोषण करनेहेतु, अब यह ठेके खोल दिये हैं!
धर्म-जाति के ठेकेदारो , मानव का शोषण अब बन्द करो,
कुछ परहित का भी सोचो ,और सेवा उनकी स्वछंद करो !
अब टीवी -अख्बारों से भी , यह कर रहे अपना प्रचार,
ऎसा लगता मानो बेच रहे हों,पापड,चट्नी और अचार!
सत्य-अहिंसा का सुबह-सुबह, जो तुम पाठ पढाते हो,
पर गद्दी से उठ कर कभी, उस पर अमल कर पाते हो!
"ये ही हमारा कर्म है",सबको यही तुम बतलाते हो,
अरबों की इनकम कर, क्यों इनकम-टैक्स बचातेहो?
इन्कम -टैक्स बचाने को, बैठे हैं यह धनवानों के दलाल,
दान-पात्र मै बटोर कर रहे , काला धन उनका ये लाल !
जिस दिन इन्कम-टैक्स ऎक्ट से,चैरिटी प्रावधान हट जाएगा,
फ़िर कोई साधू कभी, पैत्रक-समपत्ति सेआश्रम नही चलायेगा!
कभी सुनी कि गुरुकुल् मे तन्त्र-क्रियाहेतु,शिष्य बलि चढाई गई,
कभी पत्नी का श्राध कर, नारी और नन्हों की बलि चढाई गई !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकदंरा आगरा२८२००७

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