मंगलवार, 24 मार्च 2009

चाह

सदियों से थी चाह येही ,किसी को अपना कह पाऊँ!
हाय मिले जब वो ,सोच सोच येही मैं सकुचाऊँ! !
अपने अंतस का भ्रम ,इतनी जल्दी मैं क्यों झूठ लाऊँ !
टूट न जाए प्रेम पताका ,और खड़ा मैं पछताऊँ !!
लोग मिले ,और खूब मिले,पार किसे मैं पहुचाऊं !
डूब न जाऊं कहीं स्वयम ,केवल इस से घबराऊँ !!
कोई कहे -क्यों मुझे सनम ,सानिध्य न दे पाऊँ !
मैं प्रेम करुँ सभी को,पर आह किसी की न लेना चाहूं !!
है अहम् भाव यह मेरा, मैं कैसे झुक जाऊं ?
तुम ख़ुद चल कर आओ ,चाहे मैं बूढा हो जाऊं !!
सदियों से थी चाह येही ,किसी को अपना कह पाऊँ !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा -282007

मंगलवार, 10 मार्च 2009

होली


अंजुर भर कर लाल गुलाल ,मेरी मांग सजादी उसने !
पल भर में ही ख्वाब दिखाकर,मेरी जान फसादी उसने !!
में साजन समझी उसको ,होली की ठिठोली बनादी उसने !!
रात सपनो में वोह फ़िर आया,मेरी सेज सजादी उसने !
अपने दिल को दोष दे रही, मुझ में आग जगादी जिसने !!
होली ही होली में,मैं उनकी होली ,कर बैठी नादानी !

सखियाँ समझ गईं ,अंखियों की बातें,पूछें मेरी प्रेम कहानी !!

मैं कैसे कह देती उनसे ?कैसे-कैसे जान गवांदी किसने ?

अंजुर भर कर लाल गुलाल, मेरी मांग सजादी उसने !

पल भर में ही ख्वाब दिखाकर मेरी जान फसादी उसने !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

मंगलवार, 3 मार्च 2009

टीस

मेरे ज़ख्मों को न कुरेदो , इनमे टीस उठती है !
रिश्ते-नातों पर क्या तवज्जो ,इनसे खीज उठती है!!
अख़बार की सुर्खी बनी -बेटे ने मां को दर-बदर कर दिया !
मां ने फ़र्ज़ अदा किया ,बेटे ने दूध का क़र्ज़ बेअसर कर दिया !!मेरे ज़ख्मों को .......
ऐ अहसान-फरामोश !भाई गया तो गया ,कोई गम नही किया !
तूने तो मां को तसल्ली का एक का ख़त ही भी नही दिया !!मेरे ज़ख्मों को.......
तेरी हर शरारत उसे आज तक याद -हंस कर बयां करती है !
तूने उस मां को कैसे भुलाया,नौ माह कोख में रखा करती है !!
मेरे ज़ख्मों को न कुरेदो , इनमे टीस उठती है !
रिश्ते नातों पर क्या तव्वज्जो ,इनसे खीज उठती है !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007