सदियों से थी चाह येही ,किसी को अपना कह पाऊँ!
हाय मिले जब वो ,सोच सोच येही मैं सकुचाऊँ! !
अपने अंतस का भ्रम ,इतनी जल्दी मैं क्यों झूठ लाऊँ !
टूट न जाए प्रेम पताका ,और खड़ा मैं पछताऊँ !!
लोग मिले ,और खूब मिले,पार किसे मैं पहुचाऊं !
डूब न जाऊं कहीं स्वयम ,केवल इस से घबराऊँ !!
कोई कहे -क्यों मुझे सनम ,सानिध्य न दे पाऊँ !
मैं प्रेम करुँ सभी को,पर आह किसी की न लेना चाहूं !!
है अहम् भाव यह मेरा, मैं कैसे झुक जाऊं ?
तुम ख़ुद चल कर आओ ,चाहे मैं बूढा हो जाऊं !!
सदियों से थी चाह येही ,किसी को अपना कह पाऊँ !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा -282007
मंगलवार, 24 मार्च 2009
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