मंगलवार, 10 मार्च 2009

होली


अंजुर भर कर लाल गुलाल ,मेरी मांग सजादी उसने !
पल भर में ही ख्वाब दिखाकर,मेरी जान फसादी उसने !!
में साजन समझी उसको ,होली की ठिठोली बनादी उसने !!
रात सपनो में वोह फ़िर आया,मेरी सेज सजादी उसने !
अपने दिल को दोष दे रही, मुझ में आग जगादी जिसने !!
होली ही होली में,मैं उनकी होली ,कर बैठी नादानी !

सखियाँ समझ गईं ,अंखियों की बातें,पूछें मेरी प्रेम कहानी !!

मैं कैसे कह देती उनसे ?कैसे-कैसे जान गवांदी किसने ?

अंजुर भर कर लाल गुलाल, मेरी मांग सजादी उसने !

पल भर में ही ख्वाब दिखाकर मेरी जान फसादी उसने !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

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