मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

नव वर्ष २०१०


तिल तिल वर्ष २००९ इतिहास बन गया ,
माँ की ममता का कालग्रास बन गया!
उसका आंचल,उसका प्यार सब सो गया,
कयोंकि वर्ष २००९ के साथ सब खो गया!
वोह दुलार, वोह झिडकी ,कभी नहीं होंगी ,
यदि करेगा कोई ,होगा ज़रूर वो ढोगी!
उसके प्यार का दुलार का कोई नहीं सनी ,
क्योंकि वोह नव वर्ष में फिर नहीं आणि !
जो चला गया उसे यादों में सजाकर रखना,
कल नव वर्ष के भोर का स्वागत ज़रूर करना!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

रविवार, 13 दिसंबर 2009

नव वर्ष 2010

आओ आओ नव वर्ष २०१०
महगाई तो अब कर दो बस !
समस्याएँ अब न बढ़ाना ,
अलग न हो तेलंगाना !
जन आन्दोलन जगेगा,
देश फ़िर से बंटेगा !
छोटे राज्यों की भरमार होगी ,
त्राहे त्राहे बारम्बार होगी !
आर्थिक व्यवस्था तार तार होगी ,
शिबू सोरेन और गवली की सरकार होगी !
गाँधी और पटेल की आत्मा रोएगी ,
भारत माता अपना अस्तित्व खोएगी !
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा २८२007

रविवार, 12 अप्रैल 2009

कविता कब बनती है ?

मन जब आह्लादित हो,तब कविता बनती है!
जब मन आह़त हो,तब कविता बनती है !!
जब बारिश में फूल खिले हों ,तब कविता बनती है !
जब अंतस में शूल चुभे हों ,तब कविता बनती है !!
जब प्रेयसी मौन निमंत्रण दे, तब कविता बनती है !
जब प्रेयसी मनसे निष्कासन दे ,तब कविता बनती है !!
जब आंगन में किलकारी गूंजे ,तब कविता बनती है !
जब बेटी बिदा की बारी हो ,तब कविता बनती है !!
जब सावन की बौछार पड़े ,तब कविता बनती है !
जब सीमा पर गोली की मार पड़े,तब कविता बनती है !!
जब मन में उदगार उठे , तब कविता बनती है !
पता नही कब मन में ज्वार उठे ,तब कविता बनती है !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

गाँधीजी


अब तो केवल नोटों पर छपते हैं गांधीजी।

कौन कहे और कौन सुने कि राष्ट्रपिता हैं गांधीजी!!

समय बीत गया की शान्ति दूत हैं गांधीजी !

बातअहिंसा की बेमानी-भूल गए सब गांधीजी!!

देश और समाज पर आँसू बहाते गांधीजी।

नाम उन्ही का बदनाम कर रहे गांधीजी!!

उपवास रखा था शंतिहेतु,अब हाथ काट रहे एक गांधीजी।

क्या अगली पीढी को ज्ञान दिखायेंगे यह गांधीजी ?

अब तो शर्म करो ,या डूब मरो ओह गांधीजी।

गाँधी को ही बदनाम कर रहे हैं नए नए यह गांधीजी !!

बोधिसत्वकस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

मंगलवार, 24 मार्च 2009

चाह

सदियों से थी चाह येही ,किसी को अपना कह पाऊँ!
हाय मिले जब वो ,सोच सोच येही मैं सकुचाऊँ! !
अपने अंतस का भ्रम ,इतनी जल्दी मैं क्यों झूठ लाऊँ !
टूट न जाए प्रेम पताका ,और खड़ा मैं पछताऊँ !!
लोग मिले ,और खूब मिले,पार किसे मैं पहुचाऊं !
डूब न जाऊं कहीं स्वयम ,केवल इस से घबराऊँ !!
कोई कहे -क्यों मुझे सनम ,सानिध्य न दे पाऊँ !
मैं प्रेम करुँ सभी को,पर आह किसी की न लेना चाहूं !!
है अहम् भाव यह मेरा, मैं कैसे झुक जाऊं ?
तुम ख़ुद चल कर आओ ,चाहे मैं बूढा हो जाऊं !!
सदियों से थी चाह येही ,किसी को अपना कह पाऊँ !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा -282007

मंगलवार, 10 मार्च 2009

होली


अंजुर भर कर लाल गुलाल ,मेरी मांग सजादी उसने !
पल भर में ही ख्वाब दिखाकर,मेरी जान फसादी उसने !!
में साजन समझी उसको ,होली की ठिठोली बनादी उसने !!
रात सपनो में वोह फ़िर आया,मेरी सेज सजादी उसने !
अपने दिल को दोष दे रही, मुझ में आग जगादी जिसने !!
होली ही होली में,मैं उनकी होली ,कर बैठी नादानी !

सखियाँ समझ गईं ,अंखियों की बातें,पूछें मेरी प्रेम कहानी !!

मैं कैसे कह देती उनसे ?कैसे-कैसे जान गवांदी किसने ?

अंजुर भर कर लाल गुलाल, मेरी मांग सजादी उसने !

पल भर में ही ख्वाब दिखाकर मेरी जान फसादी उसने !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

मंगलवार, 3 मार्च 2009

टीस

मेरे ज़ख्मों को न कुरेदो , इनमे टीस उठती है !
रिश्ते-नातों पर क्या तवज्जो ,इनसे खीज उठती है!!
अख़बार की सुर्खी बनी -बेटे ने मां को दर-बदर कर दिया !
मां ने फ़र्ज़ अदा किया ,बेटे ने दूध का क़र्ज़ बेअसर कर दिया !!मेरे ज़ख्मों को .......
ऐ अहसान-फरामोश !भाई गया तो गया ,कोई गम नही किया !
तूने तो मां को तसल्ली का एक का ख़त ही भी नही दिया !!मेरे ज़ख्मों को.......
तेरी हर शरारत उसे आज तक याद -हंस कर बयां करती है !
तूने उस मां को कैसे भुलाया,नौ माह कोख में रखा करती है !!
मेरे ज़ख्मों को न कुरेदो , इनमे टीस उठती है !
रिश्ते नातों पर क्या तव्वज्जो ,इनसे खीज उठती है !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

वैलेंटाइन दिवस


प्यार के झरोखे से,उसने मुझे धोखे से !
इश्क का पैगाम दिया है,बहुत मौके से !!
आई लव यूं में ,जाने क्या छुपा रखा है ?
मुहब्बत के इन लफ्जों ने, दीवाना बना रखा है !!
आज तो जवानों -बूढों ने गर्मजोशी पाई है !
भूल गए सब,कोई किसी का बहन -भाई है !!
हर कोई किसी, माशूका के चक्कर में है !
इश्क और मुश्क ,आज दोनों टक्कर में है!!
जूते-चप्पल का भी, आज किसी को डर नहीं !
उन्हें शायद पता नही ,बहन उनकीभी आज घर नहीं !!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

मंगलवार, 20 जनवरी 2009

जिंदगी

जिंदगी क्या है?.......
जिंदगी है तपते हुए रेत की तरह ,
जिंदगी है सूखे पड़े खेत की तरह ,
नहीं जिंदगी है भटके हुए प्रेत की तरह ! जिंदगी है क्या ?........
जिंदगी है एक ख्याल की तरह,
चल रही है युगों से बबाल की तरह ,
नही जिंदगी है अनकहे -सवाल की तरह !जिंदगी है क्या ?.......
कुछ के लिए जिंदगी एक तराना है ,
जिसे हर किसी को गुनगुनाना है ,
कुछ नये गीत हैं कुछ पुराना है !जिंदगी है क्या?.........
जिंदगी है एक शाम की तरह,
गटक रहे हैं लोग जाम की तरह ,
नहीं ! भुगत रहे हैं आफिस के काम की तरह !जिंदगी है क्या?........
जिंदगी है एक विश्वास की तरह ,
या नवजात शिशु के श्वास की तरह ,
नही ! जिंदगी है एक मकसद खास की तरह!जिंदगी है क्या?........
जिंदगी है एक नदी की तरह ,
जी रहे हैं ,एक सदी की तरह ,
नही यह है लिखी हुई बड़ी की !जिंदगी है क्या ?........
जिंदगी है दुधारी तलवार की तरह,
कभी नफरत,कभी प्यार की तरह ,
कभी अंधड़ तो कभी बयार की तरह!जिंदगी है क्या?.........
जिंदगी है एक चाँदनी की तरह ,
या फ़िर मधुर रागिनी की तरह ,
नही यह तो है ,नव-योवना कामिनी की तरह !जिंदगी है क्या?........
जिंदगी है एक फूल की तरह ,
क्यों चुभ रही है शूल की तरह ?
कुछ जी रहे हैं एक भूल की तरह!जिंदगी है क्या?.....
जिंदगी क्या एक भूल- भुलैयां है ?
जहाँ गहन अंधकार भी है और तारों की छैयां haइ ,
नही किसी की है यह सौत तो किसी की सैयां है !
जिंदगी है क्या ?.............
बोधी सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007