गुरुवार, 25 अगस्त 2011

ज्वालामुखी

अब न कोई राह सूझती है,
न कोई रह्बर दिख रहा!
कहने की न हो हिम्मत,
फ़िर भी इबारत लिख रहा!!
कल तक भ्रष्टाचार मिटाने वाला,
शेर की खाल मे भेडिया दिख रहा !!अब न कोई.............
संसद और संविधान की आड मे,
हर कोई इधर -उधर छिप रहा !! अब न कोई.............
अब तो हमे अपनी राह बनानी है,
नौजवां कितना बेसब्र दिख रहा !! अब न कोई.............
ज्वालामुखी न कोई फ़ट पडे,
बोधिसत्व ये इबारत लिख रहा !!अब न कोई.............
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

चन्द आशार





कुछ तो मौसम की रवानगी थी,

कुछ आपकी बातों की दीवानगी थी!

वरना हम यूं ही शायर न बन जाते,

वो तो जोशे-जवानी की मर्दानगी थी!!





हम तो राहे गर्दिश मे अकेले ही चले थे,

पता नही कौन-किस मोड पर साथ हो लिया?

और धीरे धीरे कारर्वाँ बनता चला गया!



मौहब्बत के मानिंद कोई शै नही ,

काश एक बार करके तो देखी होती!

नफ़रत से भी ज़्यादा दीवानगी है इसमे,

दिलो-जाँ निसार कर भी आँख नम नही होती!





तेरे हुस्न की रानाईयाँ

मेरे इश्क की रुस्वाईयाँ,

गर कभी थम भी जायें तो,

किसी ज़लज़ले का अह्सास होता है !



बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८००७

गुरुवार, 21 जुलाई 2011

गरीब


कभी चिलचिलाती धूप मे,
किसी गरीब को नगें पाँव
चलते हुए देख एसी कार
मे बैठ्ने वाले ने पूछा,
"क्यों क्या तेरे पैर जलते नही?"
बोला "मालिक ,जानवरों के खुर होते हैं,
जो गर्म डाबर पर चलने से झुलसते नही!"
कभी दिसम्बर की सर्द रातों मे
खुले आसमान के नीचे,
फ़ुट्पाथ पर सोने वाले से
गर्म रजाई और हीटर मे
सोने वाले ने पूछा-
"क्यों बे मरने के लिये
यही फ़ुट्पाथ मिला है?"
बोला"हुज़ूर !हम तो कब के मर चुके हैं,
आप लोग अभी तलक यह क्यूं समझते नही?
तेज़ रफ़्तार मर्स्डीज़ बेंज़ से ट्क्कर मार
एक रईस ज़ादे ने पूछा -
"क्यॊं कया बहरा है?
कार की आवाज़ सुनाई नही देती,
मरने के लिये मेरी ही कार मिली है क्या?"
फ़टे हाल टीबी का मारा भिखारी बोला
ज़नाब! मरे हुए लोगों से शरीफ़ यूं उलझते नही !"
बोधिसत्व कस्तूरिया२०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

रविवार, 10 जुलाई 2011

दर्द का अह्सास

दर्द का  अह्सास
-------------------
दर्द का अह्सास ,
क्यूं कर कभी होता नही ?
प्यार की प्यास मे,
आज तक रोता नही !! दर्द का अह्सास..........
ज़ज़्बात मे बह जाये,
मैं ऐसा कोई सोता नही!!दर्द का अह्सास..........
है इल्म मुझको,बेमतलब
रिश्तों को ढोता नही !! दर्द का अह्सास..........
किसी को अपनाना कया,
मेरा कोई बेटा या पोता नही !! दर्द का अह्सास.....
हैं यही मेरी लाश की,
कपाल क्रिया पर दर्द होता नही !!दर्द का अह्सास....
बोधिसत कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

शनिवार, 25 जून 2011

बुढापा


बुढापा
------
बुढापे ने दी है दस्तक, कभी खाँसता हूं ,कभी खकारता हूं !
अब अपने अनुभवों से ,आने वाली  पीढी को  सँवारता हूं !! बुढापे....

बेशक उन्हे  नसीहत ,फ़्ज़ीहत लगे, पर उन्हे नकारता हूं !
अब बस गोली और गाली है, फ़िर भी भूखे पेट ड्कारता हूं!! बुढापे....

बच्चों की झिडकी मिलती है, फ़िर भी उन्ही को पुकारता हूं !
घर मे बाल - बच्चों से अनबन पर उन्ही को धिक्कारता हूं !!बुढापे...
.
आते हैं  नन्हे -मुन्ने, नाती -पन्थी ,बस उन्हे पुचकारता हूं !
लौट आता है बचपन ,कभी गुन गुनाता , कभी चिंघाडता हूं !!बुढापे...
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७



रविवार, 12 जून 2011

रिश्ते


अब लोग रिश्तों को कहाँ पालते है?
शादी -ब्याह पर झूठी हँसी बिखेर,
नई कहानी बना जल्द से जल्द ,
घर भागने को प्रथाओं को टालते हैं! अब लोग .........
केवल अपने ही अपने होते है,
बाकी तो केवल सपने होते हैं,
क्योंकि ऐसे रिश्ते बेवज़ह सालते हैं! अब लोग.........
कुछ लोग रिर्श्तो की अर्थी को,
बिला वज़ह कन्धा लगाते हैं,
श्मशान मे दफ़्न होने को पालते हैं!  अब लोग.......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मंगलवार, 7 जून 2011

समय की धारा

समय की धारा,कितनी अजीब है ?
जो कल तक दूर थे ,आज कितने करीब है !
जिनसे थी नफ़रत ,  ता उम्र मुझको ,
आज वो ही तो,       बन गए   मेरे रकीब है !!समय की धारा .....
किसीको मांगने  से भी मिलता नहीं ,
 कभी बिन माँगे मिला ,वो अपना नसीब है !! समय की धारा ...
रात-दिन जिनके साथ ,बरसों गुज़ारे .
अब उन्ही से मिलाने को ,फूटा यह नसीब है !!समय की धारा ...

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा 282007

शुक्रवार, 13 मई 2011

चन्द आशार



एक चाँद के टुकडे से,ऐसी बात हुई ,
वो रात ,चाँद सितारों के साथ हुई !
हम भूल गयेप्यार मे,ज़िन्दगी को,
क्यूं मेरी ज़िन्दगी,और के साथ हुई !!

इश्क मे कभी जिया या मरा नही जाता,
इसलिये किसी को मज़बूर् नही किया जाता !
वो और होंगे ,जो मर गये कभी प्यार मे,
क्योंकि किसी और को मरना नही सिखाता !!

ज़िन्दगी सरे आम बदनाम कर गई ,
वो ही आज हमे ,यूँ गुमनाम कर गई!
हम कम नही थे,तेरे प्यार मे ज़ालिम,
ये सलाहियत ही हमे बदनाम कर गई!!

तेरी गली की हवा,आज भी खुश्बू लगती है,
चाँद -सितारेकी रात भी अधूरी सी लगती है!
प्यार मे हम मर के भी यारो, नही मर सके,
तेरी हर बात ,ज़िन्दगी से अच्छी  लगती है !!

तेरी प्यारी नज़र ने, ऐसा काम कर दिया ,
मुझे सारे जहाँ मे,इस कदर बदनाम कर दिया !
वो और थे जो खुद खब गये इस इश्क मे ,
ऐ मेरे गालिब ,मरना भी इश्क सरेआम कर दिया!!

जान से ज़्यादा ज़िन्दगी ने हमे बपर्दा किया,
ऐ कफ़न तूने मुझे शर्मिन्दा क्यूं कर दिया ?
गर मर भी जाते ,तेरे प्यार मे क्या गम,
तू ने ही हर जगह शर्मिन्दा क्यूँ कर दिया !!

रविवार, 8 मई 2011

"माँ"


माँ
---
मानव का पहला समबोधन "माँ" है!
पीडा का हर  उदबोधन    "माँ है !!
जिस पर नत मस्तक पराक्रमी सब,
उस अबला का अवलम्बन  "माँ"है!!
स्र्ष्टी के हर प्राणी पर अधिकार उसे,
जीवन दात्री का अभिनन्दन "माँ"है!!
प्रतिपल,प्रति छण पूज रहा जिसको,
मानव का निश्चित संवर्धन "माँ" है!
भारतीय संस्क्रति का है यह ह्रास  ,
जन्म अधर मे लटका ,वह"माँ" है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

अन्ना हज़ारे

निकल पडा अकेला वो, भ्रष्टाचार मिटाने को !


सरकारों ने कोशिश की, बहुत उसे दबाने को !!

पहले उन्मूलन किया.महाराष्ट्र के भ्रष्टाचारियों का!

७२ वर्ष की उमर मे भी ,असर नही लाचारियों का!!

क्योंकि वह तो अलबेला है,दीवाना है मस्ताना है !

अब जाकर लोगों ने,उसके अन्तस को पह्चाना है !!

यह तो सम्बत २०६८ का महात्मा गाँधी है !

लगता है कोई तूफ़ान उठा या कोई आँधी है!!

राजनीति से ऊपर वह,तो समाज की ज्योती है!

जिससे मिलने की हम सबको अभिलाषा होती है!!

है चरण -वन्दन मेरा उस,महामहिम अन्ना हज़ारे का!

कर दिया सूत्र-पात ,भारत- माँ का कलंक मिटाने का!!



बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा-२८२००७

शनिवार, 26 मार्च 2011

जलन

कभी जिन हाथों मे गुलाल होता था,


आज उन हाथों से हलाल होता है !

कभी आदमी आदमी का रह्बर था,

अब उसको मार कर भी नही रोता है!! कभी जिन.....

किसी के दर्द को कोई क्या समझेगा?

दर्द को वही समझे,जिसे दर्द होता है!! कभी जिन....

अब तो यार की ,मय्यत पर नही रोते,

शायद रोने से ,म्रतात्मा को दर्द होता है!! कभी जिन...

अब तो सब्र की भी इन्तहा हो गई,

मलने से रंग,जलन का अह्सास होता है!! कभी जिन...

जलन घर कर गई ,हमारे आपके भीतर,

जलन का ये कफ़न,आदमी ताउम्र ढोता है!! कभी जिन......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

शनिवार, 19 मार्च 2011

Lets play holi (full vid)

होरी

मन मे फ़ूट रहा हो ज्वार

रंगो की ऊपर से पडे फ़ुहार!

भग का रंग चढा हो चकाचक,

आँगन मे खुशियों का त्योहार!

इसको ही क्या कहते हैं?

होरी मे हुरियारों का प्यार!!

मन बासंती हो जाता है ,

जब कही देखी भीगी नार !!

बूढों की बत्ती गुल हो जावे,

देख जवानी का श्रंगार !!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

रविवार, 13 मार्च 2011

किस-किस से दोस्ती निभायें

किस-किस से दोस्ती निभायें ?


और किस-किस से यारी ?

हमको तो लगती है,

बेवफ़ा दुनिया यह सारी !!किस-किस.....

जिसको भी अपना कहा ,

वो बेवफ़ा निकला !

कभी हम थे बेबस,

कभी उनकी थी लाचारी!! किस-किस.....

उनकी हर अदा पर,

हमने दुनिया निसार दी !

हो गये वो बेवफ़ा,

जब आई उनकी बारी !! किस-किस.......

अब तो नफ़रत सी हो गई,

मुहब्बत के नाम से!

उनकी दोस्ती थी झूठी ,

कयूंकर निभाते यारी !! किस-किस.....

जवानी का था ज़लज़ला,

बह गये थे जिसमे!

बुढापे मे आकर,

उतर गई सारी खुमारी !! किस-किस.....

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

होली




जब लिखी कहानी वि्धाता ने इन्सान की ,

क्यू लिखी यह दुरगति उसने जापान की !! जब लिखी....

होली हम गर खेलते है, क्या भुला पायेंगे?

११ मार्च २०११ की होली उस भगवान की !! जब लिखी.....

भूक्म्प और सूनामी क्यूं एक साथ लिखी?

यह तो प्रतीत होती है कल्पना शैतान की!! जब लिखी ......

कलियुग मे बेशक पाप का घडा भर गया,

पर बेरहमो की बलि,है गल्ती भगवान की!! जब लिखी.....

आज मै स्वच्छ्न्द हू ,यह कहने के लिये,

तुम ही सुधारो अब , नियति भगवान की!! जब लिखी...

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

शनिवार, 5 मार्च 2011

दिल की ख्वाहिशें

दिल की ख्वाहिशों को ,कहां तक अंजाम दूं ?

हँस के मिलती हो ,पता नही इसे क्या नाम दूं !! दिल की.....

मुलाकातें बहुत हो चुकीं हैं अब तलक,

सोचता हूं ,इसे अब कोई मुक्क्मिल मुकाम दूं !! दिल की .........

नज़रों से पिलाए है तुमने,जाम लाखों,

मन मे आता है कि,तुम्हे कोई अच्छा ईनाम दूं !! दिल की........

सब्र का पैमाना छलक जाने से पहले,

हसरत है कि इस दिल को भी, कुछ आराम दूं !! दिल की........

कब से दिल मे अरमां दबाए बैठा हूं ,

तुम कभी हाँ कहोगी,या मैं तुम्हे यह पैगाम दूं !! दिल की......

है तमन्ना इस दिले आशना की यह,

दूर रहो या पास हो, प्यार तुझे सुबह शाम दूं !! दिल की .......

हसरतों की दुनिया मेरी आबाद हो ,

तुम कहो तो अब, एलाने-मुह्ब्बत सरेआम दूं !! दिल की .....

सरफ़िरों ने कर दिया बदनाम तुमको,

हर तरफ़ से आती है सदा,मैं ही तुझे नाम दूं !! दिल की.......


बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

पि्त्रश्री को श्रद्धान्जलि

पि्त्रश्री को श्रद्धान्जलि




पिता के प्रयाण से यह मन छुब्द्ध है !

स्नेह की अविरल धारा अब अवरुद्ध है!!



संताप के इस समर मे नही कोई साथी?

सत्य का यह प्रष्ठ कितना अछरशः शुद्ध है!! पिता के प्रयाण ....



सिस्कियों से सम्पूर्ण धरा गुंजित हो रही है,

कहीं काग की काँव-काँव तो कहीं गिद्ध है!! पिता के प्रयाण...



कभी-कभी लगता है किसी आहट पर यही,

अभी पुकारेंगे मुझे या शायद अभी क्रुद्ध हैं!! पिता के प्रयाण ....



जीवन-मृत्यु का यह क्रम अवश्य्म्भावी है!

सिद्धार्थ से जन्मा ’बोधिसत्व’कितना प्रबुद्ध है!! पिता के प्रयाण...

सोमवार, 17 जनवरी 2011

गज़ल

गज़ल

तुम जो अपनी घनेरी- ज़ुल्फ़ से, गर कभी शाम कर दो,

कहते हैं खुदा की कसम सरे राह, इक कत्ले-आम कर दो!

देते हैं तुमको मुआफ़ी का हक, नज़रों से बस जाम भर दो!

हम तो शैदाई तेरे प्यार के,बस एक बोसा मेरे नाम कर दो !!

आगोश की नर्म गर्मी मिले,यह अफ़साना सरे आम कर दो!!



गज़ल

आपका अन्दाज़े-मोहब्बत कुछ और है!

आज हम है ,लेकिन कल कोई और है!!

कल तक जो थी,बस तेरे पाँव की जूती!

आज वो ही दीवाने ,तेरे हुए सिरमौर है!!आपका अन्दाज़....

पोशाक की मानिन्द,जो सनम बदले है,

उसका कया कहें, कया कहीं भी ठौर है? आपका अन्दाज़....

पर यह सब ज़माने की हवा ने बदला है,

इसीलिए कहते हैं,नया ज़माना नया दौर है!!आपका अन्दाज़..

आँख से टपकती मोहब्बत,दिल कुफ़्र्ज़दा है,

ऐसे लोगों पर ना जाने क्यूँ,करता तू गौरहै!! आपका अन्दाज़..



बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मो:९४१२४४३०९३

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

badhaaeeya

पोंगल,लोहडी,मकर संक्रान्ति का आया त्योहार!


आप सभी तक पहुँचे लाखों बधाईयां बारम्बार !!

नई फ़सल ,नई उमंग और २०११ का नया वर्ष !

हर मन मे जागा है,कितना उल्लास कितना हर्ष!!

जागी है फ़िर से एक नई उम्मीद एक नया जोश!

कुछ पीकर और कुछ बिन पिये हो रहे हैं मदहोश!!

सबके मन है नया करने, नया दिखाने का ज़ुनून !

नई उडाने है,साथ ही है नई कल्पनाओं का सुकून !!

इतिहास बन गया२०१० का वर्ष और बीती बात गई!

नये संकल्प से जीवन को ,सुखदाई कर डालो भई!!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा२८२००७