सोमवार, 29 नवंबर 2010

समाज

पहले खून का रिश्ता होता था ,
अब रिश्तों का खून हो रहा है !
पहले बात होती थी सम्मान की,
अब जमीर ही शून्य हो रहा है !!पहले खून .....
पहले गाँव की लड़की होती थी ,
अब बहन का रिश्ता न्यून हो रहा है!!पहले खून ...
पहले समाज की मर्यादा होती थी,
अब समाज ही शून्य हो रहा है !! पहले खून.....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा २८२००७

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

बेटी का बाप

ऐसा लगता है कि बात कल की ही है,

जब मैने अपनी बेटी को रुखसत किया !

बता सकता नहीं मैं कुछ भी आपको ,

कि यह चाक दिल मैने, कैसे-कैसे सिया !! ऐसा लगता है....

उसके रुखसार पर बहते हुए आँसू देख,

सोचा गम न कर,उसको मिल गया है पिया!! ऐसा लगता है ....

गले जब मेरे लगी,कलेज़ा मुँह को आ गया,

कह कुछ न पाया ,लगा वार दिल पर किया!! ऐसा लगता है....

अच्छी तालीम और दहेज़ देकर भी घबराता हूँ,

फ़िर भी उन्होने सीना उसका छलनी किया !! ऐसा लगता है.....

आज भी टेलीफ़ोन पर ,रोने की आवाज़ आती है

न जाने क्यूँ लगता है,किसी ने कुछ किया !! ऐसा लगता है...

अब तो सुबह,अखबार पढने से डर लगता है,

दहेज़-लोभियों ने,बेटी को तो नही जला दिया!!ऐसा लगता है....

आप नही समझेंगे, मै एक बेटी का बाप हूँ,

फ़िर क्यूँ उसे देवी का दर्ज़ा उन्होने है दिया !!ऐसा लगता है.....

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

कैसो सुन्दर सासरो?

म्हारो कैसो नीको कैसो सुन्दर सासरो?

जाने दियो है मोकूं, जीवन भर को आसरो !

म्हारी कैसी सुन्दर, सुघढ,सलोनी सासू जी?

ना कबहूं डाँटे-डपटें,ना आवन दें वे आँसूजी ! म्हारो......

म्हारी कैसी सुन्दर,सुघढ,सलोनी चाची जी ?

सबकी लेत फ़िरें खबरिया,इते-उते आती जी! म्हारो.....

म्हारी कैसी सुन्दर,सुघढ,सलोनी जेठानी जी?

घूँघटा जो कभी उठावें,भरवा दें सबको पानीजी!म्हारो......

म्हारे कैसे सुन्दर सुघढ ,सलोने देवरा जी ?

ऐसे चमकें-दमकें,जैसे कुन्दन को हो जेवंराजी !म्हारो....

म्हारो कैसे सुन्दर,सुघढ,सलोने बींद जी ?

सारे गाम की महरारू की,उडाय दई है नींदजी !म्हारो....

म्हारो ऐसो नीको,ऐसो सुन्दर सासरो,

अब न मोये ,अम्मा-बापू को आसरो! म्हारो......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

सोमवार, 1 नवंबर 2010

दीवाली

कल फ़िर कलुआ

भूखा सो गया,

पटाखों के शोर से

अचानक उसकी आँख खुल गई !

देखा द्वार पर

लक्छ्मी जी खडी हैं,

उसने पूछा-"कया चहिये?"

देवी बोली-"सेठ रतन चँद के आई थी,

सोचा तुम्हारे हाल पूँछ लूं!"

कलुआ बोला हाल तो

मँहगाई के पूछे जाते हैं,

गरीब तो मर ही रहा है!

हाँ तुम भी रईस सेठ के घर आती हो,

आज यह कलई भी खुल गई !!

लक्छ्मी जी बोलीं "दीवाली नही मनाओगे?"

कलुआ बोला "माता क्यों ठिठोली करती हो?

गरीब तो दीवाली क्या,

दीवाला भी नही मनाता !

वो भी रईसों के हिस्से मे हैं!

बच्चों की अम्मा खील लाई थी,

सो पानी मे घोंट कर पिला दी !

पटाखे और मिठाई दूर की,

आज़ तो दाल और तरकारी भी

किसी रईस के घर निकल गई !!

क्यों नीँद से जगा दिया ?

सपने मे दाल-भात खा रहा था

वो भी फ़ैला दिया !

बच्चों को तो ज़ल्दी सोना था,

क्योंकि सुबह सेठानी त्योहारी देगी ही!

उसीसे यह समझते हैं कि-

उनकी तो लाटरी निकल गई !!"

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७