कल फ़िर कलुआ
भूखा सो गया,
पटाखों के शोर से
अचानक उसकी आँख खुल गई !
देखा द्वार पर
लक्छ्मी जी खडी हैं,
उसने पूछा-"कया चहिये?"
देवी बोली-"सेठ रतन चँद के आई थी,
सोचा तुम्हारे हाल पूँछ लूं!"
कलुआ बोला हाल तो
मँहगाई के पूछे जाते हैं,
गरीब तो मर ही रहा है!
हाँ तुम भी रईस सेठ के घर आती हो,
आज यह कलई भी खुल गई !!
लक्छ्मी जी बोलीं "दीवाली नही मनाओगे?"
कलुआ बोला "माता क्यों ठिठोली करती हो?
गरीब तो दीवाली क्या,
दीवाला भी नही मनाता !
वो भी रईसों के हिस्से मे हैं!
बच्चों की अम्मा खील लाई थी,
सो पानी मे घोंट कर पिला दी !
पटाखे और मिठाई दूर की,
आज़ तो दाल और तरकारी भी
किसी रईस के घर निकल गई !!
क्यों नीँद से जगा दिया ?
सपने मे दाल-भात खा रहा था
वो भी फ़ैला दिया !
बच्चों को तो ज़ल्दी सोना था,
क्योंकि सुबह सेठानी त्योहारी देगी ही!
उसीसे यह समझते हैं कि-
उनकी तो लाटरी निकल गई !!"


बहुत सुन्दर रचना| धन्यवाद|
जवाब देंहटाएं