म्हारो कैसो नीको कैसो सुन्दर सासरो?
जाने दियो है मोकूं, जीवन भर को आसरो !
म्हारी कैसी सुन्दर, सुघढ,सलोनी सासू जी?
ना कबहूं डाँटे-डपटें,ना आवन दें वे आँसूजी ! म्हारो......
म्हारी कैसी सुन्दर,सुघढ,सलोनी चाची जी ?
सबकी लेत फ़िरें खबरिया,इते-उते आती जी! म्हारो.....
म्हारी कैसी सुन्दर,सुघढ,सलोनी जेठानी जी?
घूँघटा जो कभी उठावें,भरवा दें सबको पानीजी!म्हारो......
म्हारे कैसे सुन्दर सुघढ ,सलोने देवरा जी ?
ऐसे चमकें-दमकें,जैसे कुन्दन को हो जेवंराजी !म्हारो....
म्हारो कैसे सुन्दर,सुघढ,सलोने बींद जी ?
सारे गाम की महरारू की,उडाय दई है नींदजी !म्हारो....
म्हारो ऐसो नीको,ऐसो सुन्दर सासरो,
अब न मोये ,अम्मा-बापू को आसरो! म्हारो......
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७


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