आज तलक याद है मुझे, वो चौबन की छोरी !
कैसी सुन्दर कद -काठी, और कैसी गोरी गोरी !!
स्कर्ट-ब्लाऊज़ पहन जब वो, विद्यालय जाती थी !
अच्छे-अच्छों की तब ,आह निकल जाती थी !!
उसके नखरे,उसका गुस्सा,सब उससे डरते थे !
हिम्मत नही किसी की पडती,पर सब मरते थे !!
भाई-बहन की तरह जब हम संग-संग पढते थे!
कभी हँसते, कभी इठलाते और कभी झगड्ते थे !!
पता नही वो प्यार सच्चा था या फ़िर झूठा था !
जैसा भी था पर वो प्यार,भी खूब अनूठा था !!
पता नही कब वो मेरे मन-मन्दिर मे आ बैठी !
जान न पाया क्योंकि वो भी रहती थी एँठी-एँठी!!
मैं उनके लिये दूल्हा,वो मेरे लिये दुल्हन देखा करती!
पता नही था वो समबन्धों मे,क्या- क्या रंग भरती ?
माँ जेठानी कह पैर छुआ करती,वो उनकी समधन है !
पता नही इस जनम का या कई जनमों का बँधन है!!
सच है- संबोधन बदलने से प्यार, कभी नही बदलता है!
प्यार प्यार ही होता है , केवल समय वही बदलता है !!
राखी के रिश्ते ,समय चक्र संग फ़ीके पड जाते हैं !
पर दाम्पत्य जीवन के तो,धीरे-धीरे गड जाते हैं!!
बेशक लोग बदमाश -बेहया कहें, मुझे शर्म नही है !
संतति हेतु समर्पण विधि सम्मत है,दुष्कर्म नही है !!
इतना बडा सत्य,केवल "बोधिसत्व"लिख सकता है !
दूसरों पर हर कोई लिखता,अपनी नही लिख सकता है!!
उसने! मेरे उपवन मे है, एक सुन्दर फ़ूल उगाया है !
कह सकता हूं उसने ही, मेरा घर-आँगन महकाया है!


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