सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

चौबन की छोरी !

आज तलक याद है मुझे, वो चौबन की छोरी !

कैसी सुन्दर कद -काठी, और कैसी गोरी गोरी !!

स्कर्ट-ब्लाऊज़ पहन जब वो, विद्यालय जाती थी !

अच्छे-अच्छों की तब ,आह निकल जाती थी !!

उसके नखरे,उसका गुस्सा,सब उससे डरते थे !

हिम्मत नही किसी की पडती,पर सब मरते थे !!

भाई-बहन की तरह जब हम संग-संग पढते थे!

कभी हँसते, कभी इठलाते और कभी झगड्ते थे !!

पता नही वो प्यार सच्चा था या फ़िर झूठा था !

जैसा भी था पर वो प्यार,भी खूब अनूठा था !!

पता नही कब वो मेरे मन-मन्दिर मे आ बैठी !

जान न पाया क्योंकि वो भी रहती थी एँठी-एँठी!!

मैं उनके लिये दूल्हा,वो मेरे लिये दुल्हन देखा करती!

पता नही था वो समबन्धों मे,क्या- क्या रंग भरती ?

माँ जेठानी कह पैर छुआ करती,वो उनकी समधन है !

पता नही इस जनम का या कई जनमों का बँधन है!!

सच है- संबोधन बदलने से प्यार, कभी नही बदलता है!

प्यार प्यार ही होता है , केवल समय वही बदलता है !!

राखी के रिश्ते ,समय चक्र संग फ़ीके पड जाते हैं !

पर दाम्पत्य जीवन के तो,धीरे-धीरे गड जाते हैं!!

बेशक लोग बदमाश -बेहया कहें, मुझे शर्म नही है !

संतति हेतु समर्पण विधि सम्मत है,दुष्कर्म नही है !!

इतना बडा सत्य,केवल "बोधिसत्व"लिख सकता है !

दूसरों पर हर कोई लिखता,अपनी नही लिख सकता है!!

उसने! मेरे उपवन मे है, एक सुन्दर फ़ूल उगाया है !

कह सकता हूं उसने ही, मेरा घर-आँगन महकाया है!

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिकंदरा आगरा  282007

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