शरद पूर्णिमा की धवल चाँदनी,
कह रही इक नयी मधुर रागनी !
रात है क्रष्ण के महारास की ,
अम्रत बरस रहा है नभ से ,
करें आचमन लक्छ्मी तप से !
ताज चमक रहा है यूं चमकी,
चाँद की आभा- कान्ति दमकी !
प्रेम-प्रसून हैं मदन मुरारी .
उनको स्म्रत करती राधे प्यारी !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा २८२००७


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