शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

कब सवेरा होगा ?

समझ नहीं आता कि कब सवेरा होगा ?
जनता घोड़े बेच सो रही,जब होगा तब होगा !
दिनोदिन संगीन के साए बढ़ते जा रहे  ,
जैसे फल ,सब्जी ,दाल के भाव चढ़ते जारहे !
सियासत में तो सब चोर से ही लगते हैं ,
खिलाफत में हैं तो कमज़ोर से ही लगते हैं   !
अब तो न तू कह मेरी ,न में कहूं तेरी ,
देखना जल्द आयेगी एकदिन ,फिर सुबह मेरी !
या रब भले लोगों का भी क्या कोई दिन होगा ?
चुप बैठ ऐ दिल रात ही सा सही  वो दिन होगा !
मुझे किसी और से ऐ ज़नाब  क्या लेना ?
अगली पीढी को फिर  भी कुछ हिसाब है देना !
जो है ज़रा भी पानीदार ,वो शर्मसार हैं ,
जिन्हें शर्म ही नहीं आती ,वो गद्दार हैं !
बुजुर्गों ने कहा ,"जब जागो तब सवेरा है"
जागे तब कौन जब चारो ओर ही अंधेरा है !

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