शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

सपन

जब जब कभी तुम्हारा कोई पैगाम आया है,

बागों मे बहार न थी, फ़िर भी दिल महकाया है!

तेरे तस्स्वुर मे पूरी रात आंखो मे गुज़ार दी,

भोर मे आँख लगी,तो मुर्गे ने फ़िर बाँग दी !

चन्द लम्हों का ही सही ,साथ अच्छा था,

तुम न आए कोई बात नही,तुम्हारा साया है!! जब-जब......

जब कभी हम ख्वाबों मे आएं, आँख बन्द रखना,

बाहों मे न सही,आँख के दरीचे मे ही बन्द रखना!

हमे इस अह्सास से ही सब्र तुमने संग सुलाया है!! जब-जब...

तुम्हारे ज़िस्म की गर्मी का,इतना मुझे अह्सास होगा,

जब भी दिल से आह निकलेगी ,तेरा सनम पास होगा!

जागते सब बुलाते हैं,तूने मुझे सपनों मे सजाया है!! जब-जब...

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें