जब जब कभी तुम्हारा कोई पैगाम आया है,
बागों मे बहार न थी, फ़िर भी दिल महकाया है!
तेरे तस्स्वुर मे पूरी रात आंखो मे गुज़ार दी,
भोर मे आँख लगी,तो मुर्गे ने फ़िर बाँग दी !
चन्द लम्हों का ही सही ,साथ अच्छा था,
तुम न आए कोई बात नही,तुम्हारा साया है!! जब-जब......
जब कभी हम ख्वाबों मे आएं, आँख बन्द रखना,
बाहों मे न सही,आँख के दरीचे मे ही बन्द रखना!
हमे इस अह्सास से ही सब्र तुमने संग सुलाया है!! जब-जब...
तुम्हारे ज़िस्म की गर्मी का,इतना मुझे अह्सास होगा,
जब भी दिल से आह निकलेगी ,तेरा सनम पास होगा!
जागते सब बुलाते हैं,तूने मुझे सपनों मे सजाया है!! जब-जब...
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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