शनिवार, 26 मार्च 2011

जलन

कभी जिन हाथों मे गुलाल होता था,


आज उन हाथों से हलाल होता है !

कभी आदमी आदमी का रह्बर था,

अब उसको मार कर भी नही रोता है!! कभी जिन.....

किसी के दर्द को कोई क्या समझेगा?

दर्द को वही समझे,जिसे दर्द होता है!! कभी जिन....

अब तो यार की ,मय्यत पर नही रोते,

शायद रोने से ,म्रतात्मा को दर्द होता है!! कभी जिन...

अब तो सब्र की भी इन्तहा हो गई,

मलने से रंग,जलन का अह्सास होता है!! कभी जिन...

जलन घर कर गई ,हमारे आपके भीतर,

जलन का ये कफ़न,आदमी ताउम्र ढोता है!! कभी जिन......

बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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