सोमवार, 17 जनवरी 2011

गज़ल

गज़ल

तुम जो अपनी घनेरी- ज़ुल्फ़ से, गर कभी शाम कर दो,

कहते हैं खुदा की कसम सरे राह, इक कत्ले-आम कर दो!

देते हैं तुमको मुआफ़ी का हक, नज़रों से बस जाम भर दो!

हम तो शैदाई तेरे प्यार के,बस एक बोसा मेरे नाम कर दो !!

आगोश की नर्म गर्मी मिले,यह अफ़साना सरे आम कर दो!!



गज़ल

आपका अन्दाज़े-मोहब्बत कुछ और है!

आज हम है ,लेकिन कल कोई और है!!

कल तक जो थी,बस तेरे पाँव की जूती!

आज वो ही दीवाने ,तेरे हुए सिरमौर है!!आपका अन्दाज़....

पोशाक की मानिन्द,जो सनम बदले है,

उसका कया कहें, कया कहीं भी ठौर है? आपका अन्दाज़....

पर यह सब ज़माने की हवा ने बदला है,

इसीलिए कहते हैं,नया ज़माना नया दौर है!!आपका अन्दाज़..

आँख से टपकती मोहब्बत,दिल कुफ़्र्ज़दा है,

ऐसे लोगों पर ना जाने क्यूँ,करता तू गौरहै!! आपका अन्दाज़..



बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

मो:९४१२४४३०९३

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