मंगलवार, 16 अगस्त 2011

चन्द आशार





कुछ तो मौसम की रवानगी थी,

कुछ आपकी बातों की दीवानगी थी!

वरना हम यूं ही शायर न बन जाते,

वो तो जोशे-जवानी की मर्दानगी थी!!





हम तो राहे गर्दिश मे अकेले ही चले थे,

पता नही कौन-किस मोड पर साथ हो लिया?

और धीरे धीरे कारर्वाँ बनता चला गया!



मौहब्बत के मानिंद कोई शै नही ,

काश एक बार करके तो देखी होती!

नफ़रत से भी ज़्यादा दीवानगी है इसमे,

दिलो-जाँ निसार कर भी आँख नम नही होती!





तेरे हुस्न की रानाईयाँ

मेरे इश्क की रुस्वाईयाँ,

गर कभी थम भी जायें तो,

किसी ज़लज़ले का अह्सास होता है !



बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८००७

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