कुछ तो मौसम की रवानगी थी,
कुछ आपकी बातों की दीवानगी थी!
वरना हम यूं ही शायर न बन जाते,
वो तो जोशे-जवानी की मर्दानगी थी!!
हम तो राहे गर्दिश मे अकेले ही चले थे,
पता नही कौन-किस मोड पर साथ हो लिया?
और धीरे धीरे कारर्वाँ बनता चला गया!
मौहब्बत के मानिंद कोई शै नही ,
काश एक बार करके तो देखी होती!
नफ़रत से भी ज़्यादा दीवानगी है इसमे,
दिलो-जाँ निसार कर भी आँख नम नही होती!
तेरे हुस्न की रानाईयाँ
मेरे इश्क की रुस्वाईयाँ,
गर कभी थम भी जायें तो,
किसी ज़लज़ले का अह्सास होता है !
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८००७


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