कंक्रीट के इन जंगलोंमें सूर्य कहीं दिखता नहीं,
भ्रम हो्ता है कि कभी उगता है, या उगता नही!
तितली और भ्रमर , कभी इधर गुन्जन करते नही,
नन्हों के चित्रों में ,इसीलिये कभी ये उभरते नहीं !’
चन्दा की चौदह कलाएं,समझ इन्हे आती नही ,
मल्टीस्टोरीड में रौशनी,इसकी कभी आती नही!
दादा-दादी से इन्होने,कहानी कोई कभीसुनी नही,
क्योंकि मां-बाप से ज़्यादा कोई और गुनी नही !
मां ने जिसे कपडे ,सिल- सिल कर पाला है,
उसीकी आवाज़ आज,कोई नही सुनने वाला है!
जिस मां ने चूल्हा फ़ूंक-फ़ूंक रोटी पकाई थी,
आज अपने ही घर मे,हो गई वोही पराई सी!
घर में ही वो ,कदम फ़ूंक-फ़ूंक कर धरती है,
क्योंकि हर आहट पर,डांट उसी पर पडती है!
इन बहु-मन्ज़िली भवनोमें,कौन किसे ढोता है,
पडोसी की गमी पर,पडोसी कोई नही रोता है!
यह नई सभ्यता,समय और नये संस्कार हैं,
रिश्ते-नाते नींव मे दबे,युवाओं के विचार हैं!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा,आगरा २८२००७

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