शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

yaade

यादें
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भूलना चाहो जितना,उतना ही सताती हैं तुम्हारी यादें!
दिन तो कट जाए मगर,सारी रात रुलाती हैं तुम्हारी यादें!!
याद आती है सरे शाम ,तेरे ज़ुल्फ़ों की भीनी खुश्बू,
मस्त कर जाए मगर ,क्यूं दीवाना बनाती है तुम्हारी यादें!! भूलना चाहो....
याद आती है शबे सर्द में, तेरे जिस्म की गर्मी,
मैं पिघल जाऊंमगर, यह तो मोम बनाती है तुम्हारी यादे !!भूलना चाहो.....
याद आती है तेरी नम आखों से,अश्कों की लडी,
पी तो जाऊं मैं मगर, यह तो प्यास बढाती है तुम्हारी यादें भूलना चाहो .....
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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