गुरुवार, 27 मई 2010

सफ़र

सफ़र
९४१२४४३०९३
ज़िन्दगी के सफ़र मे जाने कौन कब जुड जाता है ?
दो कदम साथ चल कर न जाने कब बिछुड जाता है?
मिलने-बिछुड्ने का समय ,पहले से सुनिश्चित होता है!
पता नही फ़िर क्यों यह दिल, बिछुड्ने पर यूं रोता है?
प्रीति की यही रीति है,मिलन- वियोग अव्श्यम्भावी है !
कभी प्रीत की जीत मे खुशी, कभी हार का दर्द हावी है!!
मैने सर्द रातों मे प्यार के दर्द को कई बार झेला है !
कभी हर पल का साथ था,आज बिल्कुल अकेला है !!
सब जानते हैं साथ चलने की कसम,सरासर झूठी है!
कभी मै उससे रूठा नही,पर आज़ वो मुझसे रूठी है !!
फ़िर क्यों लोग बेवज़ह, साथ चलने की कसम खाते है?
करते है बार -बार वादा, खुद ही वादे से मुकर जाते है!!
जब वो वादा तोडते है, सच भीतर बडी तकलीफ़ होती है!
कभी चुपचाप दिल रोता है ,तो कभी आंख नम होती है!!
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७

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