दो दिन से बच्चों ने रोटी खाई नही,
मां होकर भी उसे
रुलाई आई नही!!
कभी सूखे ने,
फ़सल तबाह कर दी!
कभी बाढ ने
बिल्कुल स्वाह कर दी!!
अब बात खेतों के ,
अधिग्रहण की है !
जीवन पर लगने वाले
पूर्ण ग्रहण की है!!
इसीलिये रोने के बज़ाय,
लाठी उसने उठाई है!
प्रजातन्त्र मे भी,
शासक-शासित मे
कितनी बडी खाई है!!
शासक तो करोडों से
महल बना रहा है!
शसित पुश्तैनी ज़ायदाद
के लिये अपना खून बहा रहा है!!
वैसे हमारे देश मे,
प्रजातान्त्रिक सरकार है!
सम्पत्ति हमारा मौलिक अधिकार है!
इसीलिये विकास के नाम पर,
गरीबों पर पड रही मार है!!
बोधिसत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुन्ज सिकन्दरा आगरा २८२००७


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