
आज भी याद है मुझको मां,तेरा वसंत पंचमी मनाना !
उषा से साँझ तक ,मां सरस्वती के भाज़न गुनगुनाना !!
करती थी तू सरस्वती के ,महा श्रृंगार की तय्यारी !
कभी पुष्पमाला बनाना, कभी रोरी टीका लगाना !! आज भी याद .........
इस पावन पर्व पर ,पुस्तकों को हम पूजते थे !
मां सरस्वती को समर्पण कर ,प्रसाद लगाना !! आज भी याद ........
वासंती -वस्त्र धारण कर ,पुस्तकें रखते उसके समक्ष !
वंदना थी -कर कृपा ताकि पंहुंचे शीघ्र अगले कक्ष !! आज भी याद ......
पर अब न तू है, न वैसा वासंती वसंत !
छोड़ हमको विलीन हो गई ,पा गई अनंत !! आज भी याद ..........
बोधि सत्व कस्तूरिया २०२ नीरव निकुंज सिउकंदरा आगरा २८२००७

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